514 épisodes

Chanting And Recitation Of Jain & Hindu Mantras And Prayers

Rajat Jain 🕉️ #Chanting and #Recitation of #Jain & #Hindu #Mantras and #Prayers RaJaT JaiN

    • Religion

Chanting And Recitation Of Jain & Hindu Mantras And Prayers

    Pitru Suktam पितृ सूक्तम्

    Pitru Suktam पितृ सूक्तम्

    Pitru Suktam पितृ सूक्तम् ★ उदिताम् अवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
    असुम् यऽ ईयुर-वृका ॠतज्ञास्ते नो ऽवन्तु पितरो हवेषु॥1॥

    अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वनो भृगवः सोम्यासः।
    तेषां वयम् सुमतो यज्ञियानाम् अपि भद्रे सौमनसे स्याम्॥2॥

    ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासो ऽनूहिरे सोमपीथं वसिष्ठाः।
    तेभिर यमः सरराणो हवीष्य उशन्न उशद्भिः प्रतिकामम् अत्तु॥3॥

    त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठम् अनु नेषि पंथाम्।
    तव प्रणीती पितरो न देवेषु रत्नम् अभजन्त धीराः॥4॥

    त्वया हि नः पितरः सोम पूर्वे कर्माणि चक्रुः पवमान धीराः।
    वन्वन् अवातः परिधीन् ऽरपोर्णु वीरेभिः अश्वैः मघवा भवा नः॥5॥

    त्वं सोम पितृभिः संविदानो ऽनु द्यावा-पृथिवीऽ आ ततन्थ।
    तस्मै तऽ इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥6॥

    बर्हिषदः पितरः ऊत्य-र्वागिमा वो हव्या चकृमा जुषध्वम्।
    तऽ आगत अवसा शन्तमे नाथा नः शंयोर ऽरपो दधात॥7॥

    आहं पितृन्त् सुविदत्रान् ऽअवित्सि नपातं च विक्रमणं च विष्णोः।
    बर्हिषदो ये स्वधया सुतस्य भजन्त पित्वः तऽ इहागमिष्ठाः॥8॥

    उपहूताः पितरः सोम्यासो बर्हिष्येषु निधिषु प्रियेषु।
    तऽ आ गमन्तु तऽ इह श्रुवन्तु अधि ब्रुवन्तु तेऽवन्तु-अस्मान्॥9॥

    आ यन्तु नः पितरः सोम्यासो ऽग्निष्वात्ताः पथिभि-र्देवयानैः।
    अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तो ऽधि ब्रुवन्तु ते ऽवन्तु-अस्मान्॥10॥

    अग्निष्वात्ताः पितर एह गच्छत सदःसदः सदत सु-प्रणीतयः।
    अत्ता हवींषि प्रयतानि बर्हिष्य-था रयिम् सर्व-वीरं दधातन॥11॥

    येऽ अग्निष्वात्ता येऽ अनग्निष्वात्ता मध्ये दिवः स्वधया मादयन्ते।
    तेभ्यः स्वराड-सुनीतिम् एताम् यथा-वशं तन्वं कल्पयाति॥12॥

    अग्निष्वात्तान् ॠतुमतो हवामहे नाराशं-से सोमपीथं यऽ आशुः।
    ते नो विप्रासः सुहवा भवन्तु वयं स्या

    • 5 min
    Shri Lakshmi Suktam श्री लक्ष्मी सूक्तम

    Shri Lakshmi Suktam श्री लक्ष्मी सूक्तम

    Shri Lakshmi Suktam श्री लक्ष्मी सूक्तम ★
    पद्मानने पद्मिनि पद्मपत्रे पद्मप्रिये पद्मदलायताक्षि।

    विश्वप्रिये विश्वमनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व॥

     

    - हे लक्ष्मी देवी! आप कमलमुखी, कमल पुष्प पर विराजमान, कमल-दल के समान नेत्रों वाली, कमल पुष्पों को पसंद करने वाली हैं। सृष्टि के सभी जीव आपकी कृपा की कामना करते हैं। आप सबको मनोनुकूल फल देने वाली हैं। हे देवी! आपके चरण-कमल सदैव मेरे हृदय में स्थित हों।

     

    पद्मानने पद्मऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे।

    तन्मे भजसिं पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्‌॥

     

    - हे लक्ष्मी देवी! आपका श्रीमुख, ऊरु भाग, नेत्र आदि कमल के समान हैं। आपकी उत्पत्ति कमल से हुई है। हे कमलनयनी! मैं आपका स्मरण करता हूँ, आप मुझ पर कृपा करें।

     

    अश्वदायी गोदायी धनदायी महाधने।

    धनं मे जुष तां देवि सर्वांकामांश्च देहि मे॥

     

    - हे देवी! अश्व, गौ, धन आदि देने में आप समर्थ हैं। आप मुझे धन प्रदान करें। हे माता! मेरी सभी कामनाओं को आप पूर्ण करें।
    पुत्र पौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवेरथम्‌।
    प्रजानां भवसी माता आयुष्मंतं करोतु मे॥
    - हे देवी! आप सृष्टि के समस्त जीवों की माता हैं। आप मुझे पुत्र-पौत्र, धन-धान्य, हाथी-घोड़े, गौ, बैल, रथ आदि प्रदान करें। आप मुझे दीर्घ-आयुष्य बनाएँ।
    धनमाग्नि धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसु।
    धन मिंद्रो बृहस्पतिर्वरुणां धनमस्तु मे॥
    - हे लक्ष्मी! आप मुझे अग्नि, धन, वायु, सूर्य, जल, बृहस्पति, वरुण आदि की कृपा द्वारा धन की प्राप्ति कराएँ।
    वैनतेय सोमं पिव सोमं पिवतु वृत्रहा।

    सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः॥
    हे वैनतेय पुत्र गरुड़! वृत्रासुर के वधकर्ता, इंद्र, आदि समस्त देव जो अमृत पीने वाले हैं, मुझे अमृतयुक्त धन प्रदान करें।
    न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभामतिः।
    भवन्त

    • 4 min
    Bal Kaand Paath बाल कांड पाठ

    Bal Kaand Paath बाल कांड पाठ

    Bal Kaand Paath बाल कांड पाठ ■ ‘रामायण’ के प्रथम भाग को "बालकाण्ड" के नाम से जाना जाता है। इस भाग में लगभग दो हजार दो अस्सी श्लोक हैं। इस भाग का संक्षिप्त वर्णन देवर्षि नारद ने महर्षि वाल्मीकि को सुनाया था। बालकाण्ड के प्रथम सर्ग आदिकाव्य में माँ निषाद तथा दूसरे सर्ग में क्रौंचमिथुन की विवेचना की गई है। तीसरे व चौथे सर्ग में रामायण, रामायण की रचना तथा लव-कुश प्रसंग का वर्णन किया गया है। इसके अतिरिक्त दशरथ का यज्ञ, पुत्रों (राम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न) का जन्म, राम व लक्ष्मण की विद्या, राक्षसों-वध, सीता विवाह आदि का विस्तार पूर्वक विवरण मिलता है।

    बालकाण्ड का लाभ (Benefits of Balkand)

    बालकाण्डे तु सर्गाणां कथिता सप्तसप्तति:।
    श्लोकानां द्वे सहस्त्रे च साशीति शतकद्वयम्॥

    रामायण की पूरी कहानी की रूपरेखा यहीं से शुरु होती है। धार्मिक दृष्टि से रामायण के बालकाण्ड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बृहद्धर्मपुराण के अनुसार इस काण्ड का पाठ करने से समस्त पीड़ा व दुखों से मुक्ति मिलती है।

    • 4 h 19 min
    Shri Chandraprabhu Chalisa श्री चन्द्रप्रभु चालीसा

    Shri Chandraprabhu Chalisa श्री चन्द्रप्रभु चालीसा

    Shri Chandraprabhu Chalisa श्री चन्द्रप्रभु चालीसा

    • 3 min
    Shri Sarp Sukta श्री सर्प सूक्त

    Shri Sarp Sukta श्री सर्प सूक्त

    Shri Sarp Sukta श्री सर्प सूक्त ◆
    ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमा:।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।1।।


    इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासु‍कि प्रमुखाद्य:।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।2।।




    कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।3।।



    इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखाद्य।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।4।।


    सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।5।।


    मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखाद्य।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।6।।


    पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।7।।


    सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।8।।


    ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।9।।


    समुद्रतीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिन:।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।10।।


    रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।

    नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।11।।

    • 4 min
    Chandraghanta Dhyan Mantra चन्द्रघण्टा ध्यान मन्त्र

    Chandraghanta Dhyan Mantra चन्द्रघण्टा ध्यान मन्त्र

    Chandraghanta Dhyan Mantra चन्द्रघण्टा ध्यान मन्त्र ◆ वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।

    सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥

    मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।

    खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

    पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

    मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

    प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।

    कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥


    • 1m

Classement des podcasts dans Religion