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Research and Analysis of the day's top stories with Ravish Kumar.

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Research and Analysis of the day's top stories with Ravish Kumar.

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : ऑनलाइन पढ़ाई - आफत या मिठाई?

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : ऑनलाइन पढ़ाई - आफत या मिठाई?

    हमारे देश में स्कूल कॉलेज एक समान नहीं है, असमानता के सबसे बड़े सामान हैं. खराब कॉलेज, खराब यूनिवर्सिटी और खराब स्कूलों से भरा भारतवर्ष ही खुद को विश्वगुरु कह सकता है. क्योंकि जो अच्छा गुरु होता है वो कभी अपने आप को दुनिया का गुरु नहीं कहता है. एक अच्छा प्रोफेसर हमेशा क्लास में खुद को छात्र कहता है. दुनिया का इकलौत देश है भारत जिसके नेता अपने विशेषणों में विश्वगुरु लगाने की चाह रखते हैं. इसके लिए कहीं कोई एक्जाम नहीं होता है, जिसे देखिए वो हाथ में माइक लिए मंच पर विश्वगुरु-विश्वगुरु कह रहा है. कितना अच्छा होता कि भारत का कोई नेता ये कहता कि भारत को अच्छा छात्र बनना चाहिए. जो जिज्ञासू हो, जो हर चीज जाने, नई नई किताबें पढ़े, भले वो नेता चुनाव हार जाए. मैं कस्बों के कॉलेज की बात कर रहा हूं उनकी दुर्दशा बहुत ज्यादा है. ऑनलाइन...एक नई विभाजन रेखा है, ये कई स्तरों पर आपको दिखेगी. प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच, वाईफाई और लैपटॉप से लैस और इससे वंचितों के बीच और उनके बीच भी जो साधन संपन्न है. आप ऑनलाइन पढ़ाई का बोझ उठा सकते हैं, इससे आपकी पढ़ाई और समझ की समस्या खत्म नहीं हो जाती है. छात्र और टीचर के बीच का रिश्ता टूटा है. उसकी जगह नया बन रहा है और बहुत कुछ बिगड़ भी रहा है.

    • 36 分鐘
    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : सरकार है कहां, बेरोज़गार हैं यहां

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : सरकार है कहां, बेरोज़गार हैं यहां

    क्या भारत में बेरोजगारी को लेकर कोई आंदोलन चल रहा है? क्या बेरोजगारी के आंदोलन में वे ही युवा शामिल हैं जो जिंदगी के कई साल सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा देते हैं ? क्या समाज का कोई तबका इन युवाओं से सहानुभूति भी रखता है? सैकड़ों इंजीनियरिंग कॉलेजों में लाखों रुपये की फीस देकर नौकरी न पाने वाले छात्र इस आंदोलन में शामिल हैं? लाखों लोग कॉन्ट्रैक्ट की नौकरी करते हैं और नौकरी से निकाल दिए जाते हैं.क्या वे इस बेरोजगार आंदोलन में शामिल हैं?

    • 34 分鐘
    रवीश कुमार का प्राइम टाइम: प्रेस की आज़ादी पर सरकारी विज्ञापनों का डंडा

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम: प्रेस की आज़ादी पर सरकारी विज्ञापनों का डंडा

    सुप्रीम कोर्ट में सुदर्शन टीवी के प्रसारण पर रोक के बहाने कई सवाल खड़े हो गए हैं. ये वो सवाल है जो कोर्ट के भीतर और बाहर कई मौकों पर उठते ही रहते हैं. क्या कोर्ट के यह सवाल मीडिया की भूमिका उसके फंडिग में कोई बदलाव ले कर आएंगे या फिर अदालत आगे बढ़ जाएगी. पूरी बहस को दो हिस्सों में रखकर देखा जा सकता है. पत्रकारिता की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बैन किया जाना दूसरा हिस्सा है विज्ञापन और फंडिग का.

    • 40 分鐘
    रवीश कुमार का प्राइम टाइम: मजदूरों का डेटा नहीं, पत्रकारों का डेटा नहीं

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम: मजदूरों का डेटा नहीं, पत्रकारों का डेटा नहीं

    डेटा तो किसी का भी नहीं है! मजदूर का न मीडिया का न पुलिस का किसी का भी डेटा सरकार के पास नहीं है. कोविड से लड़ाई का वो डेटा है जिससे सब कुछ गुलाबी-गुलाबी दिखाना रहता है. BJD के सांसद ने एक सवाल किया कि तालाबंदी के दौरान अपने घर जा रहे कितने मजदूरों की मौत हुई? अपने लिखित जवाब में केंद्रीय श्रम मंत्रालय (union labour ministry) ने बताया कि तालाबंदी के बाद से लगभग 1 करोड़ चार लाख मजदूरों को पलायन करना पड़ा. लेकिन श्रम मंत्रालय यह बताता है कि इतने मजदूरों ने पलायन किया लेकिन यह नहीं बताता है कि कितने मजदूरों की मौत हुई.

    • 40 分鐘
    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : उमर खालिद की गिरफ्तारी - पुलिस पर उठते सवाल

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : उमर खालिद की गिरफ्तारी - पुलिस पर उठते सवाल

    क्या दिल्ली पुलिस उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में उन लोगों को फंसा रही है या डरा रही है जिन्होने नागरिकता कानून के विरोध में हुए आंदोलन में हिस्सा लिया था. 12 सितंबर को खबर आती है कि पूछताछ के दौरान सीपीएम नेता सीताराम येचुरी, जेएनयू की जयती घोष और योगेन्द्र यादव के भी नाम आए हैं. इन सभी को चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया गया है लेकिन नाम है. इस मामले में कई आंदोलनकारियों ने कई महीने जेल में काटे हैं. दिल्ली पुलिस ने रविवार रात उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया UAPA के तहत. आरोप है कि उमर ने ट्रम्प की यात्रा के दौरान लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए कहा. उमर खालिद पर 18 धारा लगायी गयी है.

    • 41 分鐘
    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : अर्थव्यवस्था का बाइस्कोप - GDP को छोड़िए, जेब में देखिए

    रवीश कुमार का प्राइम टाइम : अर्थव्यवस्था का बाइस्कोप - GDP को छोड़िए, जेब में देखिए

    जीडीपी अगर -24 प्रतिशत हो जाए तो क्या वह सरकार के लिए मायने नहीं रखती है, रखती होगी. मगर इस पर एक ढंग की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है. न विस्तार से कोई बयान आया है. लेकिन अर्थ जगत की खबरें अपने तरीके से बाहर आने का रास्ता खोज ले रही हैं .अगर आप थोड़ा रुककर और मुड़कर इन खबरों को देखेंगे तो पता चलेगा कि कितना कुछ समझना रह गया है और जानना बाकी है. अब तालाबंदी खुल गई है तो उद्योग धंधे चालू हो गए हैं. यहां से देखा जाएगा कि आगे आने वाले वक्त में कैसा सुधार होता है.

    • 36 分鐘

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