16 episodes

यहाँ हम सुनेंगे कविताएं – पेड़ों, पक्षियों, तितलियों, बादलों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों पर – इस उम्मीद में कि हम ‘प्रकृति’ और ‘कविता’ दोनों से दोबारा दोस्ती कर सकें।
एक हिन्दी कविता और कुछ विचार, हर दूसरे शनिवार...

Listening to birds, butterflies, clouds, rivers, mountains, trees, and jungles - through poetry that helps us connect back to nature, both outside and within.
A Hindi poem and some reflections, every alternate Saturday...

Khule Aasmaan Mein Kavita Nayi Dhara Radio

    • Arts

यहाँ हम सुनेंगे कविताएं – पेड़ों, पक्षियों, तितलियों, बादलों, नदियों, पहाड़ों और जंगलों पर – इस उम्मीद में कि हम ‘प्रकृति’ और ‘कविता’ दोनों से दोबारा दोस्ती कर सकें।
एक हिन्दी कविता और कुछ विचार, हर दूसरे शनिवार...

Listening to birds, butterflies, clouds, rivers, mountains, trees, and jungles - through poetry that helps us connect back to nature, both outside and within.
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    अतीत नहीं होती नदी | Ateet Nahin Hoti Nadi

    अतीत नहीं होती नदी | Ateet Nahin Hoti Nadi

    दामोदर खड़से अपनी कविता 'अतीत नहीं होती नदी' में न सिर्फ एक नदी के सौंदर्य को दर्शाते हैं, बल्कि मनुष्य के लिए उसकी प्रासंगिकता के कई पहलू भी हमारे सामने रखते हैं।



    In his poem 'Ateet Nahin Hoti Nadi', Damodar Khadse reveals to us the various ways in which a river is not only beautiful but also ever present and every relevant for mankind.



    कविता / Poem – अतीत नहीं होती नदी| Ateet Nahin Hoti Nadi

    कवि / Poet – दामोदर खड़से | Damodar Khadse

    • 12 min
    पृथ्वी का मंगल हो | Prithvi Ka Mangal Ho

    पृथ्वी का मंगल हो | Prithvi Ka Mangal Ho

    करोना लॉकडाउन के दिनों में लिखी गई अशोक वाजपेयी की यह कविता, पृथ्वी और उसके बाशिंदों के लिए एक प्रार्थना तो है ही, पर साथ ही प्रकृति पर मनुष्य की गहरी निर्भरता का एक अनुस्मारक भी है।



    Ashok Vajpeyi's poem, written during the Covid lockdown, is not only a prayer for the Earth and all its inhabitants but is also a reminder of the extent to which humanity depends on nature.



    कविता / Poem – पृथ्वी का मंगल हो | Prithvi Ka Mangal Ho

    कवि / Poet – अशोक वाजपेयी | Ashok Vajpeyi

    पूरी कविता यहाँ पढ़ें / Read the full poem here - https://www.hindwi.org/kavita/ashok-vajpeyi-kavita-6



    A Nayi Dhara Radio Production

    • 11 min
    धरती के इस हिस्से में | Dharti Ke Is Hisse Mein

    धरती के इस हिस्से में | Dharti Ke Is Hisse Mein

    राजेश जोशी की कविता 'धरती के इस हिस्से में', एक समुद्र तट का चित्रण करती है - जहाँ चिड़ियों, लहरों, मछलियों और पेड़ों की कई आवाजों के बीच भी एक गहरा एकांत है। साथ ही यह कविता हमसे यह भी पूछती नज़र आती है, कि आखिर यह एकांत अब हमारे लिए इतना दुर्लभ क्यों हो गया है?



    Rajesh Joshi's poem 'Dharti Ke Is Hisse Mein' depicts a seashore - where amidst the sounds of birds, waves, fish, and trees, there is also a deep quietude. The poem also asks us as to why this quietude has become so rare for us today?



    कविता / Poem – धरती के इस हिस्से में | Dharti Ke Is Hisse Mein

    कवि / Poet – राजेश जोशी | Rajesh Joshi

    पुस्तक / Book - Kavi Ne Kaha (Poems in Hindi) by Rajesh Joshi (Pg. 79)


    संस्करण / Publisher - किताबघर प्रकाशन (2012)

    • 11 min
    अमरफल | Amarphal

    अमरफल | Amarphal

    अरुण कमल अपनी कविता अमरफल में एक खास तरह के फल की तलाश में हैं। जो ना सिर्फ उनके बचपन की स्मृतियों से जुड़ा है, बल्कि जो अपनी ही परिपक्वता के उल्लास से फट पड़ा है। एक ऐसा फल जो प्रकृति की प्रचुरता और परिपूर्णता का प्रतीक बनकर सामने आता है।



    In his poem Amarphal, Arun Kamal is in the search of a special kind of fruit. One that is not only tied to the memories of his childhood but also one that is bursting with the joy of its own ripeness. A fruit that becomes a metaphor for the wholeness and abundance of nature.



    कविता / Poem – अमरफल | Amarphal

    कवि / Poet – अरुण कमल | Arun Kamal

    पुस्तक / Book - पचास कविताएँ - नई सदी के लिए चयन (Pg. 17)


    संस्करण / Publisher - वाणी प्रकाशन (2019)

    पूरी कविता यहाँ पढ़ें / Read the full poem here - https://www.hindwi.org/kavita/amarphal-arun-kamal-kavita



    A Nayi Dhara Radio Production

    • 11 min
    आरा मशीन | Aaraa Machine

    आरा मशीन | Aaraa Machine

    जिस आरा मशीन की बात विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अपनी कविता में करते हैं, वह ना सिर्फ कुछ पेड़ों को काटती है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के गहरे रिश्ते पर भी आघात करती है। ऐसे में यह कविता हमें सचेत करती है कि यदि हमने अपने उपकरणों को काबू में नहीं किया तो वह हमारे अस्तित्व को ही खतरे में डाल देंगे।



    The sawmill in Vishwanath Prasad Tiwari's poem 'Aaraa Machine', doesn't just cut through some trees. It also wounds our deep relationship with nature. The poem warns us that our tools, if not employed properly, have the capability of threatening our very existence.



    कविता / Poem – आरा मशीन | Aaraa Machine

    कवि / Poet – विश्वनाथ प्रसाद तिवारी | Vishwanath Prasad Tiwari

    पुस्तक / Book - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी - प्रतिनिधि कविताएँ (Pg. 42)


    संस्करण / Publisher - राजकमल पेपरबैकस (2014)



    A Nayi Dhara Radio Production

    • 11 min
    पानी क्या कर रहा है | Paani Kya Kar Raha Hein

    पानी क्या कर रहा है | Paani Kya Kar Raha Hein

    इस कविता में नरेश सक्सेना हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति कोई मृत पदार्थ नहीं बल्कि एक जीता जागता पारितंत्र है, जिसका हर तत्व उसे संतुलन में रखने के लिए अपना पूरा कर्तव्य निभा रहा है। ऐसे में वह मानव जाति से पूछते हैं कि जहाँ प्रकृति निरंतर अपना फ़र्ज़ निभा रही है, वहीं मनुष्य की ज़िम्मेदारी कौन तय करेगा?



    In this poem Naresh Saxena reminds us that nature is not just dead matter but a living, breathing ecosystem. All its elements are continuously playing their part in maintaining its equilibrium. In this context, he asks the human race, that whilst nature always plays its part, how will their responsibility get fixed?



    कविता / Poem – पानी क्या कर रहा है | Paani Kya Kar Raha Hai

    कवि / Poet – नरेश सक्सेना | Naresh Saxena

    पुस्तक / Book - Kavi Ne Kahaa (Pg. 48)


    संस्करण / Publisher - Kitabghar Prakasan (2014)



    A Nayi Dhara Radio Production

    • 12 min

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