Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

  1. Main Badha Hi Ja Raha Hun | Shivmangal Singh Suman

    18H AGO

    Main Badha Hi Ja Raha Hun | Shivmangal Singh Suman

    मैं बढ़ा ही जा रहा हूँ - शिवमंगल सिंह सुमन  आज जो मैं इस तरह आवेश में हूँ, अनमना हूँ यह न समझो मैं किसी के रक्त का प्यासा बना हूँ सत्य कहता हूँ पराये पैर का काँटा कसकता भूल से चींटी कहीं दब जाए भी तो 'हाय!' करता पर जिन्होंने स्वार्थवश जीवन विषाक्त बना दिया है कोटि-कोटि बुभुक्षितों का कौर तक, छिना लिया है लाभ-शुभ लिखकर ज़माने का ह्रदय चूसा जिन्होंने  और कल ही, बगल वाली लाश पर थूका जिन्होंने बिलखते शिशु की व्यथा पर दृष्टि तक जिनने न फेरी यदि क्षमा कर दूँ उन्हें, धिक्कार माँ की कोख मेरी चाहता हूँ ध्वंस कर देना विषमता की कहानी हो सुलभ सबको जगत में वस्त्र, भोजन, अन्न, पानी।

    2 min
  2. Adrak | Ekta Verma

    2D AGO

    Adrak | Ekta Verma

    अदरक।  एकता वर्मा  इनकी देह दुखों की अंतर्मुखी गाँठों से बनी थी  जिन्होंने अपनी कब्रों की मिट्टी ठेलकर अपनी देह के लिए जगह बनाई थी। ये आतताइयों का चरित्र पहचानते थे  और उनके द्वारा कच्चा चबाए जाने के खिलाफ  सुख की जिह्वा पर कसैलेपन की तरह उतरते थे।  वे आघातों को अपनी छाती पर सहते थे  इनका आखिरी कतरा   प्रतिबद्धताओं की तीखी गंध से महकता था।  वे रक्तबीज जैसे थे, उनके टुकड़े जहाँ गिरते  हुजूम की शक्ल में वहीं से उग आते।  उनका शरीर लोहे के तंतुओं से बँधा था  उनको तोड़कर बंदरबाँट करना आसान नहीं था।  एक दिन, इनमें से किसी ने जिसके पिता का नाम शंबूक था, ने किताब का आखिरी पृष्ठ पलटकर कहा- यह हमारी कहानी नहीं है। इस इतिहास को जला देना चाहिए !  द्रोणाचार्य की संतानों वाली सभा चीख उठी-   खीं-खीं, खीं-खीं !!!  एक औरत ने जो अहिल्या की परपौत्री थी, और मेड्यूसा की नातिन, ने कहा- मेरी योनि  एक मज़दूर की तरह खटते हुए  असंतोष का नारा उछालना चाहती है, बलत्कृत कामनाओं के नीचे दबा सुख का स्पन्दन खोज लाना चाहती है। देवराजों की सभा चिल्लाने लगी, नुकेले दांतों से नोचने-फाड़ने लगी  छी: छी: दुर्दांत! पतिता!  जंगल से खदेड़ी गई जातियों का एक वारिस राजधानी के शिक्षण संस्थान में, शोध-प्रबंध में उद्धृत करने लगा  अपने पुरखों के हत्यारों की सूची   साक्षात्कार समिति चीखी- खीं-खीं, खीं-खीं  खारिज करो, फेंको, बाहर करो! ये तिरस्कृत, बहिष्कृत, अपमानित होती जातियाँ  चाहतीं तो एक तटस्थ, समझौतावादी जीवन चुन सकती थीं। लेकिन सहमति में झुके सारों के बीच  जहाँ असहमति की उंगली उठाना अपराध हो,  वे ओखली में सिर डालकर  मूसलों को चुनौती देना धर्म की तरह चुनते हैं।  वे अदरक की तरह जीते थे। इनके होने भर से आतताइयों की नंगई ऐसे उघड़ती थी  कि वे चीखते-उछलते दाँत -नाखून दिखाते,  बंदरों के हुजूम सा दिखते।  वही बंदर जो अदरक का स्वाद नहीं जानते। दरअसल सभ्यता के विकास-क्रम में पिछड़े इन अमानुषों के लिए स्वाद भोग का विषय है  जबकि मेहनतकशों के लिए वह संघर्ष का पर्याय था जिन्होंने अपनी जिह्वा पर रोटी से कहीं ज़्यादा,  आंसुओं के स्वाद को चखा था, पसीने और पेशाब को चखा था।

    4 min
  3. Jab Jab Tum Chahoge Mujhse | Adiba Khanum

    6D AGO

    Jab Jab Tum Chahoge Mujhse | Adiba Khanum

    जब जब तुम चाहोगे मुझसे । अदीबा ख़ानम जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता मेरी जान मैं तम्हें टूट कर प्रेम दूँगी मेरे पसंदीदा मौसमों का आगाज़ हो तुम जानते हो मैं तुम्हें शिउली की तरह मिलूँगी हमेशा हर बरस बिखरती रहूँगी तुम्हारे ज़हन के कच्चे रास्तों पर उजली - उजली सुबह के शफ़्फ़ाफ़ उजालों सी कुछ क्षणों का ये मिलन यूँही न भूल पाओगे तुम, साल दर साल मेरी गन्ध से तुम्हारी स्मृतियाँ झंकृत हो उठेगी किसी नाद की तरह मैं वो हूँ जिसकी आँखें अपने पसंदीदा फूलों के वियोग में खुद फूल हो झरती रहीं हैं। मैं दुआओं में अपनी माँग लूँगी तुम्हारे लिए हर मौसम में तुम्हारे पसंद के फूल कि तुम कभी उन खुशबुओं से महरूम न रहो जिनसे तुम्हें प्रेम है क्या तुमने देखी है मुझ जैसी कोई बावरी जिसने हमेशा ही चाहा खुशबू हो जाना, कोई ऐसी गन्ध जो तुम्हारी श्वास की आवाजाही में बसे इस दुनिया में कुछ लोग ही यूँ जीते हैं कि समझ पाएँ प्रेम के जादू को और उनसे भी कम होते हैं वो लोग जिन्हें प्रेम समझने की धुन जीने नहीं देती, और देखा जाए तो मरने भी नहीं देती दर असल कविता मेरे हदय से उठी एक तीखी हूँक है और मैंने कहा भी कि जब जब तुम चाहोगे मुझसे एक प्रेम पगी कविता मेरी जान मैं तम्हें दूट कर प्रेम दूँगी।

    4 min

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

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