Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

  1. 3h ago

    Bhookh Thi | Arun Kumar Singh

    भूख थी । अरुण कुमार सिंह  क्यूंकि चीख से पहले ली गई साँस मेरा बचपन था।  क्यूंकि आँख खोलने से पहले मैं अपना नाम खोजता था।  क्यूँकि मैं पिता होने से डरता था।  क्यूंकि सुबह खिड़की खोली और सुबह से पहले सुबह की उम्मीद भीतर आई। और मैंने एक सिगरेट पी।  क्यूंकि पीड़ा पीछे ना छूटे इसलिए मैं धीमे चलता था।  क्यूंकि हँसने की क्लास में झूठ बोलने की सज़ा के लिए मुझे क्लास से बाहर खड़ा कर देते थे।  क्यूंकि आवाज़ें थीं। और उनकी भाषा नहीं आती थी।  पर वो देह पर चिपकती थीं और शोर करती थीं।  क्यूँकि मेरे हाथों में अपना ही ख़ून था जैसे आग लगी तितली।  क्यूँकि घर से निकलते हुए माँ ने हाथ चूमकर कहा था इस बार सब अच्छा होगा और फिर देर तक मेरा जाना देखती रहीं। मेरे जाने के बाद भी।  मेरे लौट आने के बाद भी।  वो मेरा जाना देखती हैं लगातार। कितने वादों के बाद भी उन्हें भरोसा नहीं दिला पाता कि मैं लौट आया।  क्यूँकि मैंने झूठ बोले इतने सच के साथ कि बाद में अंतर करना मुश्किल हो गया। और नदी डूब गई।  क्यूंकि मैं नदी का शोकगीत था।  क्यूंकि हमने क़सम खायी थी कि हम साथ रहेंगे और फिर अपने अपने हिस्से की दीवार लेकर चले गए। छत अब भी वहीं हैं।  क्यूंकि प्रेम नाम का जानवर विलुप्त हो रहा था। और किसी को उससे फर्क नहीं पड़ता था। क्यूंकि वो फ़ूडचैन का हिस्सा नहीं था।  क्यूंकि देह ने जिस दिन पलटकर मुझसे खेलना शुरू किया तो मैं सह नहीं पाया।  क्यूंकि मेरे घर में एक छोटे सूरज ने अपनी जान दे दी थी और आसमान नहीं बचा था उसे गाड़ने के लिए।  क्यूंकि समय मेरा पिता था।  क्यूंकि कच्चा नाखून काटने के लिए क़ानून में कोई सज़ा नहीं लिखी।  क्यूँकि मैं भूख की गर्दन भींचकर बैठा था।  क्यूँकि पिता ने भविष्यवाणी की थी कि मैं बर्बाद हो जाऊँगा।  और माँ मूक आँसू रोई थी।  क्यूँकि पिता ने जब समय पूछा तो मैंने हमेशा झूठ बोला कि  अच्छा है।  पहले है।  बाद में है।  ठीक समय कभी नहीं बताया  क्यूँकि कहना था।  क्यूँकि मैं था - जैसे जैसे जीवन था  और बहुत था  बहुत ज़्यादा था।

    Bhookh Thi | Arun Kumar Singh
  2. 1d ago

    Pita Ka Abhinay Siddhant | Anurag Tiwari

    पिता का अभिनय सिद्रांत ।  अनुराग तिवारी  पढ़ाते हुए तमाम अभिनय सिद्धांत गुरु कहते हैं खोजो अपना "मेथड़' मेथड खोजते हुए मैंने खोजा पिता को अपने पिता को! गदोरी में सुरती मलते दुआर पर बैठे पिता को देखना वह स्वाभाविक तस्वीर है जो स्मृति में पहली बार आती है पिता ने कभी नहीं सीखा अभिनय का गुण फिर भी मैं सोचता हूँ यथार्थवादी अभिनय के अविर्भाव की प्रेरणा कहीं मेरे पिताजी तो नहीं थे जो अपार हताशा के दिनों में बैठे बिल्कुल सहज गदोरी में सुरती मलते रहते हैं दुख उनके साथ चाय पीकर वापस लौट जाता है चिंता घंटों बैठे उनसे सलाह माँगती है किस्सा सब सुनाते हैं लेकिन पिताजी जैसा कोई नहीं मुझे लगता है भरत मुनि के सूत्रधार की प्रेरणा कहीं मेरे पिताजी तो नहीं थे  जिनकी कहानी में बहाव नहीं दिखता, ठहराव दिखता है भूमिका के बाद पहले पीक थुूकी जाती है 'तप्ते' को घेर कर बैठे उत्सुक श्रोताओं से गिलास भर पानी मंगाया जाता है । चाय मिले तो शाबाश। फिर एक एक घूंट के अंतराल पर कहानी बढ़ती जाती है। अभिनय में मैं पिता जैसा होना चाहता हूँ  अपने पिता जैसा

    Pita Ka Abhinay Siddhant | Anurag Tiwari
  3. 5d ago

    Thakna Bhi Lazmi Tha | Zafar Iqbal

    थकना भी लाज़मी था । ज़फ़र इक़बाल  थकना भी लाज़मी था कुछ काम करते करते कुछ और थक गया हूँ आराम करते करते अंदर सब आ गया है बाहर का भी अंधेरा ख़ुद रात हो गया हूँ मैं शाम करते करते ये उम्र थी ही ऐसी जैसी गुज़ार दी है बदनाम होते होते बदनाम करते करते फँसता नहीं परिंदा है भी इसी फ़ज़ा में तंग आ गया हूँ दिल को यूँ दाम* करते करते कुछ बे-ख़बर नहीं थे जो जानते हैं मुझ को मैं कूच कर रहा था बिसराम करते करते सर से गुज़र गया है पानी तो ज़ोर करता सब रोक रुकते रुकते सब थाम करते करते किस के तवाफ़ में थे और ये दिन आ गए हैं क्या ख़ाक थी कि जिस को एहराम करते करते जिस मोड़ से चले थे पहुँचे हैं फिर वहीं पर इक राएगाँ सफ़र को अंजाम करते करते आख़िर 'ज़फ़र' हुआ हूँ मंज़र से ख़ुद ही ग़ाएब उस्लूब-ए-ख़ास अपना मैं आम करते करते

    Thakna Bhi Lazmi Tha | Zafar Iqbal
  4. Oct 28

    Yeh Prithvi Kya Kewal Tumhari Hai ? | Gyanendrapati

    यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है।  ज्ञानेन्द्रपति एक शक्तिशाली राष्ट्र के सिरमौर! तुम्हारी उल्लसित कल्पनाओं में पृथ्वी तुम्हारी उँगलियों पर नाचता क्रीड़ा-कंदुक -ठीक वैसा जैसा 'दि ग्रेट डिक्टेटर' में चैपलिन  ने दिखाया था तुम उसे राष्ट्र की शक्ति-साधना कहते हो जब परमाणु बम के भूमिगत परीक्षण से फिर-फिर  थर्राते हो पृथ्वी की मिटटी-देह  पयस्वती पृथ्वी के मर्मस्थल में मारकर घूँसा विश्व-मानव-समुदाय में अपनी वज्रमुट्ठी लहराते हो नृशंस विजेता की बर्बर मुद्रा में निरस्त्रीकरण-वार्ताओं के दौरान कैमरों के योग्य चकाचौंधी उजाले में सभ्य-सौम्य-निष्पाप दिखते भी हर बार  लेकिन मैं जानता हूँ पाषाण युग से भी पीछे हैं वे पाषाण-हृदय, जो अत्याधुनिकों में अग्रगामी गिनते हैं ख़ुद को उनको मानव होना शेष अभी मैं तुम्हीं से पूछता हूँ एक शाक्तिशाली राष्ट्र के सिरमौर ! दूसरे मुल्कों में मानवाधिकारों के उल्लंघन से आहत मुखमंडल के गिर्द लिये, सुदृश्य प्रभामंडल  सुमत्सारणबद्धपर्यन्तमंडल में बैठे तुम में फटक भी नहीं सकता जिसके करीब वहीं से अपने सचिव के कान की मार्फत गुप्तचर संस्था के प्रधान की मार्फत पूछते हो तुम मैं कौन, पूछनेवाला तुम से कुछ भी मैं कौन, पृथ्वी के बारे में करनेवाला कोई सवाल मेरी क्या हैसियत मैं किस खेत की मृूली वैसे भी, जब खेतों पर मालिकाना तुम्हारा तुम्हारे या भाई-गोतियों के खतियान में दर्ज सब जो दर्ज किए जाने योग्य है जोत-कोड़ किसी की, हक हकूक तुम्हारे ! शोषकों-शासकों का कुनबा देश-भेद नाम-भेद के बावजूद एक। मैं कहता हूँ चक्रवर्ती के चक्के के नीचे आने को तैयार मैं एक कवि पृथ्वी-सूक्त के रचयिता का वंशज नहीं तुम्हारा मर्म कंपाउं, नहीं तुम्हारा हृदय दुखाऊँ-गानेवाले कवि का वंशज वंशज कंद-मूल खनने के लिए पृथ्वी से क्षमा माँगनेवाले कवि का पृथ्वी पर चलकर, उसे रौंदने के लिए क्षमा माँगनेवाले विनतमाथ कवि का उन्नतभाल वंशज  मैं पूछता हूँ यह पृथ्वी क्या केवल तुम्हारी है ? क्या तुम्हें एक केंचुए के पास जाकर पृथ्वी को उर्वर करने में तल्लीन केंचुए के पास नहीं पूछना चाहिए पृथ्वी के बारे में कोई भी अहम फ़ैसला लेने से पहले! कौन जाने, पृथ्वी के भविष्य को ले, तुमसे ज़्यादा  चिन्तित रहती हों चीटियां! मेरी हैसियत एक केंचुए की हो चींटी की तरह कुचल दी जाने की औकात ही हो मेरी तुम्हारे निकट मेरा मानवाधिकार तुम्हारे दानवाधिकार के आगे नाचीज़! मैं तुम्हारे लिए खेत की मूली ही सही चलो, तुम्हारे ही खेत की और लो, सचमुच की- इस पृथ्वी पर मेरा अधिकार तुमसे कम तो नहीं पृथ्वी के अँधेरे में जागा हुआ जीवन पृथ्वी के बारे में क्या तुमसे कुछ कम जानता है। कि उसकी राय न जानी जाये पृथ्वी का भविष्य तय करते वक्त! एक शक्तिशाली राष्ट्र के सिरमौर! (अपने ज्वलनशील अहं से परमाणु बमों के विस्फोटक लाल बटनवाले काले ब्रीफ़केस को बस उतनी दूर लिये जितनी अपनी बीड़ी से पिटरोल पिटरोल टैंकर का पियेला ड्राइवर!)

    Yeh Prithvi Kya Kewal Tumhari Hai ? | Gyanendrapati

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