Manoj Kumar

Manoj bassi

राखी की चुनौती

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  1. शहीद भगत सिंह प्रस्तुति:- किरन हिन्दी शिक्षिका सरकारी मिडल स्कूल भुमाल लुधियाना।

    20/11/2020

    शहीद भगत सिंह प्रस्तुति:- किरन हिन्दी शिक्षिका सरकारी मिडल स्कूल भुमाल लुधियाना।

    क्रांतिवीरों की जब भी बात होगी उस श्रेणी में भगत सिंह का नाम सबसे ऊपर होगा। ग़ुलाम देश की आज़ादी के लिए अपनी जवानी तथा संपूर्ण जीवन भगत सिंह ने देश के नाम लिख दिया। शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 ई. को पंजाब के ज़िला लायलपुर गाँव बंगा (पाकिस्तान ) में हुआ। इनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह, माता का नाम विद्यावती कौर व चाचा का नाम सरदार अजीत सिंह था।इनका परिवार देशभक्त और इंकलाबी परिवार था। जिसका प्रभाव भगत सिंह पर पड़ना स्वाभाविक ही था।भगत सिंह की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के प्राइमरी स्कूल से हुई। प्राथमिक शिक्षा पूरी होने के पश्चात 1916-17 ई. में इनका दाख़िला लाहौर के डी.ए. वी. स्कूल में करा दिया गया। भगत सिंह का सम्बन्ध देशभक्त परिवार से होने के कारण वे शूरवीरों की कहानियाँ सुनकर बड़े हुए। साथ ही विद्यालय में उनका संपर्क लाला लाजपतराय तथा अंबा प्रसाद जैसे क्रांतिकारियों से हुआ। उनकी संगति में आकर अब भगत सिंह के अंदर देशभक्ति का ज्वालामुखी सुलगने लगा 13अप्रैल 1919 ई. जलियाँवाला बाग में बैसाखी वाले दिन अंग्रेज़ अफ़सर जनरल डायर ने हज़ारों की संख्या में एकत्रित लोगों पर गोलियाँ बरसा कर उनकी हत्या कर दी। इस दुखांत का भगत सिंह के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। 30अक्तूबर 1928 ई. में साइमन कमीशन के लाहौर पहुँचने पर ' नौजवान भारत सभा ' ने इसका विरोध करते हुए जुलूस निकाला। इस जुलूस का नेतृत्व लाला लाजपतराय कर रहे थे।अंग्रेज़ों ने जुलूस पर लाठियाँ बरसा दीं।जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह से घायल हो गए। कुछ दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। भगत सिंह ने लाला जी की मृत्यु का बदला अंग्रेज़ अफ़सर सांडर्स की हत्या कर के लिया। भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने 8अप्रैल 1929 ई. को केन्द्रीय विधानसभा में बम फेंककर अंग्रेज़ी सरकार की क्रूरता का जवाब दिया। फिर उन्होंने 'इन्कलाब ज़िंदाबाद' के नारे लगाते हुए अपने आपको गिरफ़्तार करवा दिया । उन्हें जेल हो गई। जेल में लिखें उनके ख़तों और लेखों से उनके विचारों का पता चलता है कि वे अपने देश और देशवासियों से कितना प्रेम करते थे। 23 मार्च 1931 ई. शाम को भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को निश्चित दिन से एक दिन पहले ही फांसी दे दी गई। उनकी फांसी से भारतीय जनता कहीं भड़क कर किसी आंदोलन पर न उतर आए। इस डर से अंग्रेज़ों ने उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके दूर हुसैनीवाला में मिट्टी का तेल डालकर जला दिए। जिस वक़्त भगत सिंह को फांसी दी गई। तब वे केवल 23 वर्ष के थे। उन्होंने स्वयं से पहले सदैव अपने देश और देशवासियों को प्राथमिकता दी।इसीलिए उनके बलिदान के इतने वर्षों बाद भी वे हम सब के दिलों में जीवित हैं तथा नवयुवकों के लिए हमेशा प्रेरणास्रोत रहेंगे।

    5 min
  2. दीपावली प्रस्तुति किरन सरकारी मिडल स्कूल भुमाल, लुधियाना, मनोज कुमार, मुनीष कुमार

    01/11/2020

    दीपावली प्रस्तुति किरन सरकारी मिडल स्कूल भुमाल, लुधियाना, मनोज कुमार, मुनीष कुमार

    *दीपावली* दीपावली का त्योहार  कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है जो अक्तूबर या नवंबर महीने में पड़ता है। दीपावली भारतवर्ष में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में सबसे महत्वपूर्ण है। इसे सभी धर्मों के लोग आदर, श्रद्धा और हर्षोल्लास से मनाते हैं। दीपावली के दिन श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या लौटे थे। उनके वापस आने की ख़ुशी में अयोध्यावासियों ने घी के दीपक जलाए थे । सिक्ख समुदाय इसे बन्दी छोड़ दिवस के रूप में मनाता है। जैन समुदाय, इस दिन को भगवान महावीर के 'मोक्ष दिवस' के रूप में मनाता है । दीपावली की तैयारियाँ कई दिन पहले शुरू हो जाती हैं। लोग अपने घरों, दुकानों आदि की सफाई का कार्य आरंभ कर देते हैं। घरों में मरम्मत, रंग-रोगन आदि का कार्य होने लगता है। लोग दुकानों को भी साफ-सुथरा कर सजाते हैं। बाज़ारों में बहुत रौनक होती है। बच्चे इस दिन पटाख़े और आतिशबाज़ी चलाते हैं। रात को लक्ष्मी देवी की पूजा की जाती है। कई लोग इस दिन जुआ खेलते और शराब पीते हैं, जो कि बहुत बुरी बात है। हमें इस त्योहार को पवित्रता से मनाना चाहिए।

    24 min
  3. कुमारी कालीबाई

    27/10/2020

    कुमारी कालीबाई

    राजस्थान में एक ज़िला है डूंगरपुर। इस ज़़िले में एक गाँव है रास्तापाल। रास्तापाल गाँव में एक स्मारक बना है। यह स्मारक एक आदिवासी बालिका की बहादुरी और बलिदान की निशानी है। 13 साल की लड़की आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़ी और अपने प्राणों की बलि दे दी। आप सोच सकते हैं कि 13 साल की बालिका में यह राजनीतिक जागरूकता कहाँ से आई होगी? उसके हृदय में देश-प्रेम की आग कैसे लगी होगी? फिर ऐसी बालिका जो कच्ची उमर की हो, आदिवासी जाति की हो, कैसे क्राँतिकारी बन बैठी? आश्चर्य की बात तो है ही, पर बात सच है। उसके जीवन की एक अनोखी कहानी है ।बालिका का नाम था कुमारी कालीबाई। कुमारी कालीबाई के माँ-बाप कौन थे, इस बात का तो पता नहीं चल सका, पर इतना ज़रूर पता चला कि कुमारी कालीबाई रास्तापाल गाँव की आदिवासी लड़की थी। रांस्तापाल गाँव तथा आसपास का इलाका आदिवासियों का इलाका है घटना 1947 की है। बस, आजादी मिलने ही वाली थी, तभी रास्तापाल गाँव में यह घटना घटी। गाँव में एक स्कूल था। इस स्कूल में एक शिक्षक थे, जिनका नाम था नानाभाई खाँट । इस स्कूल को भोगीलाल पंडया नामक एक व्यक्ति चलाते थे पंडया जी गुप्त रूप से अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ कुछ काम किया करते थे । स्कूल क्रॉतिकारी गतिविधियों का अड्डा था। स्कूल के दो अध्यापक नानाभाई खाँट और सेंगाभाई क्राँतिकारी गतिविधियाँ चलाते थे । वे क्राँतिकारियों की सभाएँ करते, पर्चे बँटवाते, सूचनाएँ भिजवाते । ये सारे काम गुप्त रूप से किए जा रहे थे । पर कोई बात कब तक गुप्त रहती, एक न एक दिन भेद खुलना ही था। अंग्रेज़ों को इन सारी बातों का पता चल गया। अंग्रेज़ सरकार ने डूंगरपुर के महारावत लक्ष्मणसिंह को सूचित किया कि वह रास्तापाल गाँव का स्कूल बंद करवा दें। वे लक्ष्मणसिंह के कुछ लोग, कुछ सिपाही तथा सेना के जवान लेकर गाँव पहुँचे। उनके साथ डूंगरपुर के ज़िलाधीश भी थे। सिपाहियों ने नानाभाई खाँट और सेंगाभाई से स्कूल बंद कर देने को कहा। उन्होंने जवाब दिया- " हम लोग कौन होते हैं स्कूल बंद करने वाले। स्कूल तो पंडया जी चलाते हैं। वे जानें ।" ज़िलाधीश ने भी स्कूल बंद कर देने को कहा। पर उन लोगों ने उनकी भी बात नहीं मानी। इस पर चिढ़कर ज़िलाधीश ने पुलिस को आदेश दे दिया कि वे दोनों अध्यापकों को मारपीटकर ठीक कर दें। बस, लगी पुलिस डंडा बरसाने। नानाभाई खाँट को तो मारते मारते वहीं ढेर कर दिया और सेंगाभाई को जीप के पीछे रस्सियों से बाँध दिया। सेंगाभाई की यह हालत देखकर कालीबाई दौड़कर जीप के सामने आ गई और बोली - "छोड़ दो मास्टर साहब को। इन्होंने क्या ग़लती की है?" एक सिपाही बोला, "भाग जा सामने से, नहीं तो गोली मार दूँगा।" उस निडर लड़की ने कहा, "मार, देखती हूँ कैसे मारेगा । " बस, इतना कहकर वह दौड़कर जीप के पीछे आ गई और एक कचिया से रस्सियाँ काट दीं। सेंगाभाई छूट गए और आनन-फानन में वहाँ से रफूचक्कर हो गए। रह गई वहाँ अकेली कालीबाई। यह देखकर सैनिकों ने कालीबाई पर गोलियों की बौछार कर दी। कालीबाई की जीवनलीला समाप्त हो गई। कालीबाई के मरने की ख़बर सुनकर हज़ारों की संख्या में भील आदिवासी वहाँ इकट्ठा हो गए। उन्होंने अपना मारू बिगुल बजा दिया और घेर लिया उन अंग्रेज़ों को । भारी भीड़ देखकर वे जीप में सवार होकर भागे वहाँ से । आदिवासियों ने उनका पीछा किया । वे भागते रहे । आदिवासी तब तक उनका पीछा करते रहे जब तक उनकी जीप दूर जाकर ओझल नहीं हो गई। देश की आज़ादी के लिए कालीबाई निछावर हो गई । एक जीवन की कहानी खत्म हो गई , लेकिन ख़त्म नहीं हुई, शुरू हुई। कालीबाई अगर साधारण जिंदगी जीतीं तो उनका नाम शायद कोई न जानता। लेकिन उन्होंने ऐसा काम कर दिखाया जिससे वह हमेशा के लिए अमर हो गईं। उसका जीवन इतिहास बन गया । ऐसा इतिहास, जिसको पढ़कर देश की हर एक युवती, युवक देशभक्ति की प्रेरणा लेता रहेगा ।

    6 min

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