Gita Acharan

Siva Prasad

Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.

  1. Oct 27

    248. कर्म ही आधार है

    सामान्यतः यह माना जाता है कि आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए भगवद्गीता तीन मार्गों की शिक्षा देती है -सांख्ययोग, जो बुद्धि-प्रधान व्यक्तियों के लिए ज्ञान और जागरूकता का मार्ग है; भक्तियोग, जो हृदय-प्रधान व्यक्तियों के लिए समर्पण का मार्ग है; और कर्मयोग, जो मन-प्रधान व्यक्तियों के लिए कर्म या क्रिया का मार्ग है। श्रीकृष्ण कहते हैं “केवल अज्ञानी ही सांख्य और कर्मयोग को भिन्न बताते हैं, न कि ज्ञानी। जो इनमें से किसी एक में भली-भाँति स्थित होता है, वह दोनों के फल प्राप्त करता है” (5.4)। यह संकेत करता है कि केवल बालक या प्रारंभिक साधक ही इन तीनों मार्गों को अलग-अलग मानते हैं। जैसे-जैसे हम भगवद्गीता के अध्ययन में आगे बढ़ते हैं, यह स्पष्टता आएगी कि ये तीनों मार्ग आपस में गुँथे हुए और एक-दूसरे के पूरक हैं। इससे यह स्पष्टता मिलती है कि कर्म ही इन सभी मार्गों की नींव है क्योंकि प्रत्येक मार्ग किसी-न-किसी रूप में कर्म से ही जुड़ा हुआ है। जागरूकता के लिए कोई व्यक्ति अध्ययन, गुरु की सेवा या ध्यान से प्रारम्भ कर सकता है। भक्ति के मार्ग में प्रारंभिक अवस्था में यह कर्मकांडात्मक हो सकता है परंतु इसका सार यह है कि साधक चोर में, शत्रु में और यहाँ तक कि गधे में भी परमात्मा को देख सके। भगवद्गीता के अंत में श्रीकृष्ण कर्मयोग का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक कर्म स्वभावतः कुछ न कुछ दोषों से युक्त होता है। यह समझ हमें उन अपराधबोध और घृणाओं से मुक्त करती है जिन्हें हम अपने कर्मों के प्रति पालते हैं क्योंकि हमारा विभाजनकारी मन उन्हें अच्छा या बुरा कहकर विभाजित करता है। वे हमें प्रेरित करते हैं कि वर्तमान क्षण द्वारा हमें प्रदान किए गए सहज कर्म को अपनी सर्वोत्तम क्षमता के अनुसार करते रहें। चाहे कोई भी मार्ग क्यों न हो, उसका सार यही है कि प्रत्येक कर्म को यहसमझते हुए किया जाए कि आदर्श कर्म दुर्लभ है; कर्म को आसक्तिरहित होकर किया जाए; उसके फल की अपेक्षा न की जाए और घृणातथा इच्छा, दोनों का त्याग किया जाए। श्रीकृष्ण आश्वासन देते हैं कि स्वकर्म के प्रति निष्ठा सिद्धि की ओर ले जाती है क्योंकि यही समर्पण वास्तव में उनकी उपासना है (18.45)।

    248. कर्म ही आधार है
  2. Oct 19

    247. सभी कर्म दोषयुक्त हैं

    श्रीकृष्ण कहते हैं “प्रत्येक कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है, जैसे अग्नि धुएँ से आच्छादित होती है; अतः सहज कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए” (18.48)। यहाँ ‘सहज कर्म’ का अर्थ हमारे स्वाभाविक कर्तव्यों से लिया गया है। एक अन्य दृष्टि से, इसका अर्थ ‘अस्तित्व से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले कर्मों’ से भी लगाया जा सकता है। चाहे कोई भी अर्थ लिया जाए, श्रीकृष्ण का निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक कर्म किसी न किसी दोष से युक्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी कर्म पूर्णता का पर्याय नहीं होता। श्रीकृष्ण ने कर्म के संदर्भ में अनेक शब्दों का प्रयोग किया है -जैसे अकर्म, विकर्म, और नियत कर्म । परंतु उन्होंने कहीं भी ‘शुद्ध कर्म’ करने की सलाह नहीं दी क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी प्रकार के दोष से युक्त होते हैं। उदाहरण के लिए हमारा प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) प्रतिदिन अनगिनत विषाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट कर हमें रोगों से बचाता है। यदि ‘हिंसा’ को स्वभावतः अशुद्ध माना जाए तो जीवित रहना स्वयं ही अशुद्ध कर्म बन जाता है। इस प्रकार, हमारे अशुद्ध अस्तित्व द्वारा किया गया कोई भी कर्म अनिवार्य रूप से अशुद्ध ही होगा। यही स्थिति श्वास-प्रश्वास और भोजन ग्रहण करने जैसे कर्मों की भी है। यह समझ एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। प्रथम, यह हमें उस प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने में सहायता करती है जिसमें हम अपने ही कर्म को नापसंद या उससे विरक्त हो जाते हैं -विशेषकर तब, जब हमें दूसरों के कर्म अधिक श्रेष्ठ प्रतीत होते हैं। यह दृष्टिकोण हमें स्पष्टता प्रदान करता है और हमारे ध्यान को हमारे स्वयं के कर्म पर केंद्रित करने में सहायता करता है। श्रीकृष्ण पहले ही आश्वस्त कर चुके हैं कि अपने स्वकर्म के प्रति निष्ठा सिद्धि (सम्पूर्णता या मुक्ति) की ओर ले जाती है (18.45)। इसके अलावा यह समझ हमें स्वयं में तथा दूसरों में दोष खोजने की प्रवृत्ति से मुक्त होने में सहायता करेगी (9.1)। हमारे अतीत के कर्मों के प्रति अपराधबोध और पश्चात्ताप हमें जीवनभर संचालित करते रहते हैं। इसी प्रकार हम दूसरों के कर्मों के प्रति भी द्वेष पाले रहते हैं क्योंकि वे हमारे जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। यह श्लोक हमें इन पछतावों और अपराधबोध से मुक्त करता है तथा यह समझ कर द्वेष पर विजय पाने में सहायता करता है कि कर्म स्वयं ही दोषयुक्त होते हैं और इन दोषों के लिए किसी और को दोष देने की आवश्यकता नहीं है।

    247. सभी कर्म दोषयुक्त हैं
  3. Oct 14

    246. एक साधे सब सधै

    कहा जाता है कि सृष्टि मात्र एक लीला (दैवी खेल) है और इस खेल को रोचक बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। जैसे फुटबॉल के खेल में यदि गोलपोस्ट बहुत छोटा या बहुत बड़ा हो जाए तो खेल का रोमांच समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार, जन्म के बाद मृत्यु का आना, विभाजन या पृथक्करण का होना -ये सभी सृष्टि के ऐसे रोचक नियम हैं जिन्होंने जीवन के विकास में योगदान दिया और अंततः हमारे जैसे जटिल जीवन-रूपों का निर्माण हुआ। ये विभाजन व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों स्तरों पर विद्यमान हैं -जैसे जाति, धर्म, नस्ल, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर -और ये हमें जीवन के आरंभिक चरण में ही प्रभावित कर देते हैं। चुनौती यह है कि हम इन विभाजनों से ऊपर उठें और इस दिशा में श्रीमद्भगवद्गीता हमारा पथ-प्रदर्शन करती है। ऐसी ही एक विधि है स्वकर्म के प्रति समर्पण। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं“अपने स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि (पूर्णता यामुक्ति) को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्याप्त है” (18.45-18.46)। यह निरन्तर सीखते रहने की प्रक्रिया है, जब तक हम इस प्रक्रिया का आनन्द लेते हैं और दूसरों की सम्पत्ति या शक्ति से विचलित नहीं होते। यदि हमारी प्रसन्नता दूसरों की सेवा करने में है तो हमें उसी मार्ग पर चलते रहना चाहिए -भले ही समाज उसे किसी भी दृष्टि से क्यों न देखे। हमें जो कार्य मिला है उसे अपनी पूरी क्षमता के साथ करते रहना चाहिए। क्षमा जैसे दैवी गुण (16.3) को विकसित करके द्वेष को त्यागकर कर्म करना चाहिए न कि दूसरों के मोहक कर्मों में उलझकर और न ही अपने अतीत के पश्चात्ताप या भविष्य की अपेक्षाओं में बंधकर। स्वकर्म के प्रति ऐसा समर्पण वास्तव में ईश्वर की उपासना ही है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने गीता के प्रसिद्ध श्लोक (2.47) में कहा है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, कर्मफल में नहीं; क्योंकि प्रत्येक कर्म में हमें सिद्धि की ओर ले जाने की क्षमता निहित है।

    246. एक साधे सब सधै
  4. Oct 5

    245. कर्म ही पूजा है

    सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है। श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है। आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से होता था। इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि अपने स्वभाव से उत्पन्न स्वकर्म को पूर्ण निष्ठा से करते हुए मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर सकता है। वास्तव में महत्व इस बात का है कि चाहे हम किसी भी प्रकार का कार्य करें, उसे अपने सर्वोत्तम रूपमें करें। दूसरे, हमारा विभाजनकारी मन श्रेणियाँ बनाने का अभ्यस्त है और ये श्लोक इस भ्रमित धारणा को दूर करते हैं कि वर्ण व्यवस्था श्रेणीबद्ध है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मों में कोई श्रेणियाँ नहीं हैं -केवल अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार किए गए स्वकर्म का पालन करके भी मनुष्य सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त कर सकता है। तीसरे, श्रीकृष्ण ने पहले यह उपदेश दिया था कि ज्ञानी व्यक्ति को उन अज्ञानियों को विचलित नहीं करना चाहिए जो कर्मों से आसक्त हैं (3.26)। उपर्युक्त श्लोक इस उपदेश का समर्थन करते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनेगुणों से उत्पन्न कर्मों के माध्यम से सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इसलिए जो व्यक्ति किसी एक मार्ग से सिद्धि प्राप्त कर चुका है उसे अन्य मार्गों को तुच्छ या हीन नहीं समझना चाहिए।

    245. कर्म ही पूजा है
  5. Sep 30

    244. वर्गीकरण की विशेषताएँ

    जीवन का विकास, विभाजनों और भिन्नताओं का परिणाम है। किंतुइन विभाजनों के पीछे एक ‘एकत्व’ विद्यमान है जैसे विभिन्न मोतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला अदृश्य धागा (7.7)। उद्देश्य यह है कि हम अपने चारों ओर दिखाई देने वाले अव्यवहारिक और तर्कहीन विभाजनों के मध्य उस ‘एकत्व’को अनुभव करने की क्षमता विकसित करें। यह क्षमता ‘एकत्व’ की जागरूकता और अपने कर्मों में संतुलन स्थापित करने के माध्यम से विकसित की जा सकती है (2.38, 6.16)। श्रीकृष्ण ने गुणों और कर्मों के आधार पर समाज के चार वर्गों का उल्लेख किया है। वे कहते हैं “शांति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक और आस्था; ये सब गुण ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक गुण हैं (18.42)। पराक्रम, शक्ति, धैर्य, कौशल, युद्ध से पीछे न हटना, दानशीलता और नेतृत्व क्षमता; ये क्षत्रियों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्महैं (18.43)। कृषि, गोपालन और वाणिज्य; ये वैश्यों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्म हैं। सेवा से संबंधित कार्य शूद्रों के स्वाभाविक कर्म हैं”(18.44)। ये वर्गीकरण न तो जन्म पर आधारित हैं, न ही इनमें कोई श्रेणीभेदहै, और न ही ये किसी की योग्यता का सूचक हैं। जैसे गुणों के संदर्भ में लक्ष्यउन्हें अतिक्रमित कर ‘गुणातीत’ होना है, वैसे ही यहाँ भी चुनौती इनसामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर ‘एकत्व’ की अनुभूति प्राप्त करना है -विशेषकर तब, जब हम स्वयं को इनमें से किसी एक वर्ग के साथ जोड़कर देखते हैं। दूसरा, कभी हम ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं; कभी शक्ति या धन अर्जित करने का। कभी-कभी हम अपने परिवार, मित्रों या सहकर्मियों आदि की सेवा करते हैं। यह दर्शाता है कि हम समय-समय पर चारों वर्गों के गुणों को प्रदर्शित करते रहते हैं। तीसरा, यद्यपि कोई एक गुण हमारे जीवन में प्रमुख हो सकता है,फिर भी हम प्रायः एक ही दिन में विभिन्न गुणों से होकर गुजरते हैं। यही बात इन सामाजिक वर्गों पर भी लागू होती है। चौथा, पिछली शताब्दी में विश्व कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक और फिर सेवा-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ गया है। जैसे-जैसे बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, कोई भी एक वर्गीकरण या गुण न तो प्रमुख माना जा सकता है और न ही पूर्ण।

    244. वर्गीकरण की विशेषताएँ
  6. Sep 27

    243. गुण ही विभाजन का कारण हैं

    श्रीकृष्ण कहते हैं “मैंने गुणों और कर्मों के भेद के अनुसार चार वर्णों (विभाजनों) की रचना की है; परंतु मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो (4.13)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -ये सब अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसारकर्म करते हैं” (18.41)। पहली बात, हमारा विभाजनकारी मन हमारे चारों ओर श्रेणियाँ बना लेता है। दूसरी बात, असत्य वास्तव में एक विकृत सत्य के सिवा कुछ नहीं है। इन दोनों के मिलन से यह असत्य धारणा बनी कि सामाजिक वर्ग जन्म पर आधारित और श्रेणीबद्ध हैं। परंतु सच्चाई यह है कि मनुष्य उनके गुणों और कर्मों के कारण चार प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त, यह विभाजन किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करने का मापदंड नहीं है। वर्णों या जातियों से संबंधित श्लोकों को समझते समय इन तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि वर्ण और जाति आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर प्रभाव डालते हैं। गुणों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं “सत्व, रजस् और तमस् -ये तीन गुण आत्मा को शरीर से बाँधते हैं (14.5)। सत्व ज्ञान के प्रति आसक्ति के माध्यम से बाँधता है (14.6)। रजस् जीवात्मा को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है (14.7)। तमस् प्रमाद और आलस्य के द्वारा बांधता है” (14.8)। प्रत्येक गुण हमें किसी न किसी तरह से बाँधता ही है। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर एक गुण जीवनभर हावी रह सकता है जोउसके स्वभाव और व्यवहार को आकार देता है। फिर भी सूक्ष्म स्तर पर प्रत्येक दिन इन गुणों का एक गतिशील परस्पर खेल होता है। उदाहरण के लिए जबकार्यालय में हमें ऐसा कार्य सौंपा जाता है जिसमें अतिरिक्त ज्ञान की आवश्यकता होती है तो सत्त्वगुण हमें वह ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करता है। रजोगुण वह इच्छा है जो हमें कार्य को समय-सीमा के भीतर पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। दिन के अंत में जब हम थक जाते हैं तो तमोगुण हमें विश्राम और नींद प्रदान करता है। इसी प्रकार यदि हम किसी नए स्थान की ओर वाहन चला रहे हैं तो दिशा का ज्ञान सात्त्विक गुण है और वाहन चलाना राजसिक गुण है। बन्धन गुणों के स्वभाव में निहित है और उन पर निर्भरता ही बन्धन का निर्माण करती है। स्वर्ण जंजीरें भी बन्धन को लोहे की जंजीरों से बेहतर नहीं बनाते। गुणातीत होना इस बन्धन से परे जाना है -उस परम स्वतंत्रता को प्राप्त करना जहाँ गुण साधन बन जाते हैं, स्वामी नहीं।

    243. गुण ही विभाजन का कारण हैं
  7. Sep 8

    242. सभी गुणों से प्रभावित हैं

    श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों -सत्त्व, रजस् और तमस्, का विभिन्न प्रसंगों में विस्तार से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर या इस भौतिक जगत् के उच्चतर लोकों में कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो (18.40)। इसका अर्थ यह है कि किसी भी समय हम किसी न किसी गुण के प्रभाव में रहते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं सभी परिस्थितियों में कर्म गुणों द्वारा ही संपन्न होते हैं; परंतु जो व्यक्ति अहंकार से मोहित होता है, वह सोचता है -‘मैं कर्ता हूँ’ (3.27-3.29)। जो ज्ञानी इस सत्य को समझते हैं, वे आसक्त नहीं होते। गुणों में हमेंसम्मोहित कर देने की सूक्ष्म शक्ति होती है और उनके प्रभाव में हम गुणों के कार्यों से ही आसक्त हो जाते हैं। सत्रहवें और अठारहवें अध्यायों मेंगुणों के अनेक कार्यों -जैसे उपासना, आहार, यज्ञ, तप (शरीर, वाणी और मन का), दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति (दृढ़ता) और सुख -का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। श्रीकृष्ण आगे का मार्ग बताते हुए हमें प्रेरित करते हैं कि हम इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत बनें -जो सुख और दुःख में समान रहते हैं, आत्मस्थित होते हैं, सुखद और दुःखद परिस्थितियों में एकरस बने रहते हैं, निंदा और स्तुति दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं, सम्मान और अपमान में समान रहते हैं, मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, और ‘मैं कर्ता हूँ’ -इस मोह का पूर्ण परित्याग कर देते हैं (14.24-14.25)। जबकि कर्ता का स्वभाव उस समय प्रभावी गुण (सत्त्व, रजस् और तमस्) पर निर्भर करता है, श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि गुणातीत वह है जो कर्तापन के मोह को ही त्याग देता है। इसी तरह सुख का भी स्वरूप गुणों के अनुसार बदलता रहता है परंतु गुणातीत व्यक्ति के लिए न किसी विशेष सुख की लालसा होती है और न ही किसी दुःख से विरोध। संक्षेप में, यहसमझना है कि जीवन गुणों के पारस्परिक प्रभाव का एक खेल है।

    242. सभी गुणों से प्रभावित हैं
  8. Sep 7

    241. सुख की रूपरेखा

    हमारे जीवन में सुख और दुःख की द्वैत स्थितियाँ निरन्तर अनुभव होती रहती हैं। श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैंतब सुख-दुःख की द्वंद्व अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं (2.14)। प्रशंसा हमें सुख देती है जबकि निन्दा दुःख पहुँचाती है; यद्यपि दोनों ही केवल शब्दों के कानों सेटकराने की घटनाएँ मात्र हैं। इस प्रकार, जीवन इन्द्रियों और इन्द्रिय-विषयों के सतत संपर्क का परिणाम है जिससे स्पष्ट होता है कि सुख-दुःख का द्वंद्व मानवीय अस्तित्व की अपरिहार्य स्थिति है। श्रीकृष्ण सुख को तीन प्रकारों में विभाजित करते हैं जो तीनों गुणों सेउत्पन्न होते हैं (18.36)। वे कहते हैं “जो आरंभ में विष के समान और अन्त में अमृत के समान होता है, उसे सात्त्विक सुख कहा गया है। यह उस बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है जो आत्मज्ञान से प्रकाशित होती है” (18.37)। इस प्रकार, सात्त्विक सुख वही है जैसे मन के लिए ध्यान और शरीर के लिए व्यायाम। प्रारम्भ में इन्हें करना कठिन लगता है और नियमितता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है परंतु समय के साथ ये मन की शांति और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में गहन और स्थायी आनन्द प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं “जो सुख इन्द्रियों के उनके विषयों के संयोग से उत्पन्न होता है, जो आरंभ में अमृत के समान और अन्त में विष के समान होता है, वह राजसिक कहा गया है” (18.38)। स्वादिष्ट भोजन जैसे मिठाइयाँ खाना या धूम्रपान करना उस क्षण में आनन्द देता है परंतु समय के साथ शरीर को अपूरणीय हानि पहुँचाता है। श्रीकृष्ण कहते हैं “वह सुख जो प्रारम्भ से अंत तक आत्मा को मोहितकरने वाला है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, उसे तामसिक कहा गया है” (18.39)। यह वह सुख है जो अज्ञान से उत्पन्न होता हैजैसे नींद या आलस्य से मिलने वाला सुख। कुछ लोगों के लिए सुख व्यक्तिगत उपलब्धियों में निहित होता है जबकि दूसरों के लिए वह संन्यासी या परोपकारी जीवन में मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो आनुवंशिकता (genetics) हमारे सुख या दुःख की प्रवृत्तियों को प्रभावित करती है। इसके मूल चाहे जो भी हों, श्रीकृष्ण के अनुसार सुख अंततः तीन प्रकार का होता है, जो किसी भी समय हम पर प्रभाव डालने वाले प्रमुख गुण द्वारा निर्धारित होता है।

    241. सुख की रूपरेखा

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