Intezarnama by Ankitsarma

Ankitsarma

it's all about metaphor and love we feel around, i pen them...

Avsnitt

  1. मोहल्ला (Mohalla) इन्तज़ारनामा

    2024-08-30

    मोहल्ला (Mohalla) इन्तज़ारनामा

    कान में ये गुलाब काहे खोंस रखा है ? पौधे में अच्छा नहीं लग रहा था क्या ? बड़ी ही उजड्ड किस्म है तुम्हारी लोगों की। कहीं भी फूल दिखा कि रीछ बन जाती हो कहते हुए नज़र थम गई थी, ज़ुबान को तो जैसे ताला लग गया था। बाल पाटी किए। पायल में दो घुँघरू के साथ का वॉल्यूम एक, जिससे आती आवाज़ लिए तुम्हारा बढ़ते आ जाना। फिरोजी रंग का कुरता उसमें सुआपंखी दुपट्टा डाले तुम चली आयी थी। पीछे से गाना बज उठा था - मोहल्ले विच्चों कूच न करीं...। सिल्वर स्क्रीन में मानो मधुबाला चली आई हो। आँख में ठहरा काजल, भौंहें कतार बध्द जैसे परफेक्शन में खिला कुरते जैसा ही फिरोजी गुलाब हो। सब कुछ स्टेच्यू था। मैं पुराने टेप रेकॉर्डर की रील सा फँस चुका था। वो गुलाब तुम्हारे जूड़े के आगोश में जा रहा था। तुम्हारी मुस्कान चौड़ी हो रही थी। मैं फँसी कैसेट सा न कुछ बोल पा रहा था ना ही चुप रह पा रहा था। मेरी धमनियों में मानो बर्फ घिसी जा चुकी थी। कोई ऐसे कैसे हो सकता है भला कि व्यक्ति अवाक हो जाए ? होता होगा, ईश्वर ही जाने, लेकिन इसके पहले तक ये क्यों न दिखी ये भी ईश्वर ही जाने!! बस ईश्वर ये बता दे कि मैं कब बोल पाउँगा ? मेरा टेप रेकॉर्डर खराब है या रील या... खैर ये सब छोड़िये, ये बताइये, वो थी कौन ? अब नज़र को क्या हुआ यार। मैं जा रहा हूँ घर। आपको भी चलना है ? कहते हुए मैं मुड़ कर जा रहा था कि तभी नज़र फिर उन्ही उद्दंडियों पर पड़ी, हिदायत थी पर एक शर्त के साथ कि - वो थी कौन ? बताओगी तो गुलाब तोड़ सकोगी नहीं तो सोच लेना। ज्यादा इंतजार नहीं करूँगा। उसी शाम पास ही के घर में शादी थी। कुछ सरसरी निगाह से देखा था। शादी वाले घरों में अक्सर ऐसे गुलाब चुन कर ले जाए जाते रहे हैं और शायद कई बार मन भी। इन्तज़ारनामा

    3 min

Om

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