Ruhaani Poems

Suman Rakesh Shah

Listen it by your heart because I write poetry through core of my heart.

  1. 11/02/2022

    मन

    नमस्कार दोस्तों मैं सुमन राकेश शाह( Ruhaani poetry) आज फिर आपके साथ हूँ मेरी आवाज़ मेरे अल्फाज़ में और आज मैं बात करुँगी "मन" की … आज मन नहीं है, आज मेरा मन उदास है, आज मन नाच रहा है किसी ज्ञानी ने तो ये भी कहा है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत…. तो आज हम उसी मन की बात करेंगे मैने अपने दिल को ही सवालों के कटघरे में खडा कर दिया क्योंकि थक चुकी हूँ उसकी मनमर्ज़ी से कभी तो सुने ये दिमाग की, दिमाग अपने अनुभव से कुछ कहता है और ये दिल चोट खाकर भी पिघल जाता है स्थिर रहना गलत नही है, मजबूत बनना और दिखना दोनो ही वक़्त और हालात होते है जिन्हे सभी को स्वीकारना होता है...सुमन अनगिनत इच्छायें मन की, अंधे कुँए सी, जितनी पूरी करो नई सर उठाती है, फिर भी.. मन की खुशी कहाँ मिल पाती है देर हो उससे पहले जागना होगा इस आब ए सराब को समझना होगा..सुमन जब जो चाहा, पाया मगर फिर भी ख्वाहिशों की फहरिस्त कम न हुई ..… सुमन जिन्दगी मे हमेशा ही कुछ अधूरा रहा जब अपने अंतर में झाँका तो वहाँ खुद को मुक़म्मल ही पाया… सुमन बात नही करनी तो कुछ नही, बस ज़रा सा मुस्कुरा दो सुना है इक हल्की मुस्कान से रिश्तें और दिल चटकने से बच जाते है..सुमन हार के पीछे जो संघर्ष और सबक छुपा है वहीं तुम्हारी जीत का आगाज़ है ..… सुमन

  2. 10/31/2022

    बेबस मोहब्बत

    हैलो दोस्तों मैं सुमन राकेश शाह इक लंबे अंतराल के बाद इक बार फिर हूँ आपके साथ,  बेशक आप सभी ने दिवाली की छुट्टियों का आनंद लिया होगा मेरी शुभकामना है कि आपका नया इसी तरह हंसी खुशी बीते…  कल मैंने इक पुरानी movie देखी थी केदारनाथ,  इतनी लाचार मोहब्बत देख के सोचने लगी …कि  सरहदें और धर्म तो इंसानों ने बनाए  और प्रेम ईश्वर का आशीर्वाद  फिर भी न जाने क्यूँ हर बार,   ईश्वर को इंसान से हारना पड़ता है ...सुमन और उसी पर कुछ लिखा है  कैसी लाचार मुहब्बत है, ना पंख है, ना जुबां न स्वछंद आसमां में उड़ती, न मैदानों में दौडती है अकेले ऊंचे पहाड़ों में गूंजकर लौट आती है  फिर वहीं उनके पास, सुनने वाला कोई भी नही  ये पहाड़ गवाह बने मगर हमेशा खामोश ही रहे सैकड़ों सालों से मंज़िल की तलाश में भटकती मुहब्बत को छुआ था इन्हीं हवाओं ने,  नदी, पहाड़, फ़िजा सब वहीं थे ज्यों के त्यों बनते रहे है बेबस मुहब्बत के गवाह  कितने ही सुलगते अरमान समा गए इनमें मगर ये खामोश खड़े है अचल, बहते रहे है अविरल और बेबस मुहब्बत हार के दम तोड़ देती हैं या खामोशी में घुट के जी लेती है ..सुमन

  3. 09/27/2022

    बादलों की हसीन दुनिया

    आज कुछ बच्चो के लिये लेकर आई हूँ और बच्चे ही क्यूँ हम बड़ों को भी बादलों की दुनिया हमेशा लुभाती है ना…तो …आज चलो मेरे साथ बादलों की दुनिया की सैर कर आते मै पहुँची आज बादलों की अज़ब दुनिया में बादलों की सड़कें थी, बादलों के ही थे पहाड़ रुई सी नरम थी वो बादलों की सफ़ेद दुनिया गम ए ज़िन्दगी कितने छोटे हो गए वहां परियों की छोटी सी दुनिया थी जो सपनों की दुनिया दिखा कर मुझे बचपन की कहानियां याद दिला गयी मै खेलती, उड़ती.... दौड़ रही थी एक खरगोश, एक हिरन के संग एक बादल से ..दूसरे बादल को फांद रही थी इस सफ़ेद, नीली सी दुनिया के ख्यालों में डूबती - उतरती सी घूम रही थी तभी एक काले बादल ने.. रास्ता मेरा रोक दिया नन्हा सा ये दिल मेरा ...मानो धड़कना ही भूल गया मै घबरायी, पैर फिसल गया और मैं गिर पड़ी नीचे गिरते गिरते पहुँच गयी फिर अपनी दुनिया में अपनों के बीच,... खुद पे ही हंस पडी मेरी अपनी दुनिया भी कुछ... बुरी तो नहीं .... सुमन

  4. 09/22/2022

    तुम्हारे बिना

    दोस्तो मैं सुमन राकेश शाह इक बार फिर आपके साथ हूँ meri आवाज, मेरे अल्फाज़ में…और आज लेकर आई हूँ "तुम्हारे बिन" 2020 में जब कोरोना आया था तब डरे सहमे घरों में सुरक्षित थे हम मगर इन तीन सालों में हमने कितने अपनों को खोया है और वो भी all of sudden.… और अब तक वहीं सिलसिला चल रहा है, उसी भाव के साथ कुछ पंक्तिया लिखी है तुम्हारे बिना सब ज्यों का त्यों है फिर ये दिल इतना उदास क्यों है दुनिया तो वही की वही फिर ये सूना सूना सा हमारा जहां क्यूं है, चाहते है हँसना खिलखिलाना फिर से मगर दिल की ये बंदिशे क्या है, यादें तुम्हारी दिल मे बसा के चलना जरा मुश्किल है साथ वो घड़ी भर का था मगर यादें अनंत है जानतें तो हम भी है कि इक दिन चले ही जाना है सब को फिर ये दिल इतना उदास क्यूं है । तुम्हारे बिना ये जग सूना सूना क्यूं है...सुमन

About

Listen it by your heart because I write poetry through core of my heart.