श्री ज्ञानेश्वरी वाचन | अध्याय 1 | ओवी 1-5| Ravi Vare

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श्री ज्ञानेश्वरी वाचन ________________________________________ तर तर्कु तोचि फारशु | नीतिभेदू अंकुशु | वेदान्तु तो महारसु | मोदकु मिरवे ||११|| एके हातीं दंतु | जो स्वभावता खंडितु | तो बौद्धमतसंकेतु | वार्तिकाचा ||१२|| मग सहजे सत्कारवादु | तो पद्यकर वरदु | धर्मप्रतिष्ठा तो सिद्धु | अभयहस्तु ||१३|| देखा विवेकवंतु सुविमळु | तोचि शुंडादंडु सरळु | जेथ परमानंद केवळु | महासुखाचा ||१४|| तरी संवादु तोचि दशनु | जो समता शुभ्रवर्णु | देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षणु | विघ्नराजु ||१५|| ________________________________________

Episodes

  1. 06/04/2020

    || श्रीज्ञानेश्वरी || अध्याय : १ ओवी : 26-30 |Ravi vare

    || श्रीज्ञानेश्वरी || अध्याय : १  ओवी : २६-३० का तीर्थें जियें त्रिभुवनीं | तियें घडती समुद्रा ― वगहानीं | ना तरी  अमृतरसास्वादनीं | रस सकळ ||२६|| तैसा पुढतपुढती तोचि | मियां अभिवंदिला  श्रीगुरुचि | जो अभिलाषित मनोरुचि | पुरविता तो ||२७||  आतां अवधारा कथा गहन  | जे सकळां कौतुकां जन्मस्थान | कीं अभिनव उद्यान | विवेकतरूचें ||२८||  ना  तरी सर्व सुखाची आदि | जे प्रमेयमहानिधि | नाना नवरस - सुधाब्धि |   परिपूर्ण हे ||२९||  कीं परमधाम  प्रकट | सर्व विद्यांचें मूळ पीठ |  शास्त्रजातां वसौट | अशेषांचें ||30||  ना तरी सकळ धर्मांचें माहेर |  सज्जनांचें जिव्हार | लावण्यरत्नभांडार | शारदेंचें ||३१||

    || श्रीज्ञानेश्वरी || अध्याय : १ ओवी : 26-30 |Ravi vare
  2. 06/03/2020

    || श्रीज्ञानेश्वरी || अध्याय : 1 ओवी : 21 - 25 | Ravi Vare

    || श्रीज्ञानेश्वरी || अध्याय : १    ओवी : २१ - २५ आतां अभिनव वाग्विलासिनी | जे चातुर्यार्थकलाकामिनी | ते श्रीशारदा  विश्वमोहिनी | नमिली मियां ||२१||  मज हृदयीं सद्गुरु | जेणें तारिलों हा  संसारपूरु | म्हणऊनी विशेषें अत्यादरु | विवेकावरी ||२२||  जैसें डोळ्यां  अंजन भेटे | ते वेळीं दृष्टीसी फांटा फुटे | मग वास पाहिजे तेथ प्रगटे |  महानिधी ||२३||  कां चिंतामणि आलिया हातीं | सदा विजयवृत्ति मनोरथीं | तैसा  मी पूर्णकाम श्रीनिवृत्ति | ज्ञानदेवो म्हणे ||२४||  म्हणोनि जाणतेनें गुरु  भजिजे | तेणें कृतकार्य होईजे | जैसें मूळसिंचनें  सहजें | शाखापल्लव  संतोषती ||२५||

    || श्रीज्ञानेश्वरी || अध्याय : 1 ओवी : 21 - 25 | Ravi Vare

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श्री ज्ञानेश्वरी वाचन ________________________________________ तर तर्कु तोचि फारशु | नीतिभेदू अंकुशु | वेदान्तु तो महारसु | मोदकु मिरवे ||११|| एके हातीं दंतु | जो स्वभावता खंडितु | तो बौद्धमतसंकेतु | वार्तिकाचा ||१२|| मग सहजे सत्कारवादु | तो पद्यकर वरदु | धर्मप्रतिष्ठा तो सिद्धु | अभयहस्तु ||१३|| देखा विवेकवंतु सुविमळु | तोचि शुंडादंडु सरळु | जेथ परमानंद केवळु | महासुखाचा ||१४|| तरी संवादु तोचि दशनु | जो समता शुभ्रवर्णु | देव उन्मेषसूक्ष्मेक्षणु | विघ्नराजु ||१५|| ________________________________________