एक कहानी

Farhat Khan

रूबरू

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  1. 07/12/2020

    आँगन का वो पेड़ पुराना, "Aangan ka wo ped purana"

    बचपन की, हर याद में, शायद वो मेरा साझी है, मुझे बनाकर, ओझल होता, वो मेरा माज़ी है | टहनियों में जिसकी झूल कर खेला करता था दोपहर की धूप में थक कर जहाँ सोया करता था || दिल को चोट लगती थी तो उसीसे बात करता था, ख़ामोशी से सब सुनता था, जब कभी मैं रोया करता था | दूर आ गया हूँ बहुत, पर सब याद रहता है, वैसे हर घर में एक खूबसूरत पुराना पेड़ रहता है || वक़्त की, सर्द और गर्म हवाओं, ज़िम्मेदारियों में अब ग़ुम सा रहता है माँगता कभी कुछ नहीं बस जिसे जो चाहिए, वो दिआ करता है | आँगन का वो पेड़ पुराना, घर जाऊँ तो जैसे झूमने लगता है, कहता कुछ नहीं, खुश तो है, अंदर ही अंदर, मगर चुप रहता है || आँगन का वो पेड़ पुराना अब चुप रहता है

    2 min

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