Ravi Saying

Ravi ranjan

Poems, stories and Romance !

  1. दिसंबर-मानव कौल, रवि रंजन

    12/14/2022

    दिसंबर-मानव कौल, रवि रंजन

    आज कुछ बेहद नीरस है, जैसे तुम्हारे शरीर के वो बारह तिल वो बारह तिल बारह महीनों की तरह है में हमेशा से साल बचाना चाहता था में कसकर मुट्ठी भींचता मगर हर महीना दो उंगलियों के बीच से हस्ता हुआ फिसल जाता हर बार साल खत्म होने पर जब में मुट्ठी खोलता तो ग्यारह तिल जा चुके होते थे मगर एक दिसंबर न फसा रह जाता था रेखाओं में कहीं हमेशा वो दिल्ली में दिसम्बर की ठंड थी , जब हमने आखरी बार गले लग कर एक दूसरे को विदा कहा था । उस धुंध में तुम्हारे मफ़लर से झाँकता हुआ ।तुम्हारी गर्दन पर बैठा वो दिसंबर का तिल तुम्हारे जाने के बाद रह गया था मेरे पास साल बड़ी आसानी से खत्म हो जाते है मगर दिसंबर हाथ नही छोड़ता है आज भी ।

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