Vinay Iztirar

Vinay इज़्तिरार

Its all about life stories. Love is everywhere.

  1. 08/05/2022

    दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल: भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ

    भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ  आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुद्दआ । मौत ने तो धर दबोचा एक चीते कि तरह  ज़िंदगी ने जब छुआ तो फ़ासला रखकर छुआ ।  गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नही  पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बददुआ ।  विज्ञापन क्या वज़ह है प्यास ज्यादा तेज़ लगती है यहाँ  लोग कहते हैं कि पहले इस जगह पर था कुँआ ।  आप दस्ताने पहनकर छू रहे हैं आग को  आप के भी ख़ून का रंग हो गया है साँवला ।  इस अंगीठी तक गली से कुछ हवा आने तो दो  जब तलक खिलते नहीं ये कोयले देंगे धुँआ ।  दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो  उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ ।  इस शहर मे वो कोई बारात हो या वारदात  अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं

    4 min
  2. 07/08/2022

    भगत सिंह ने जब काउंसिल हाउस में बम फेंका, कैसे की थी तैयारी

    उस ज़माने में काउंसिल हाउस जो कि आज का संसद भवन है, का शुमार दिल्ली की बेहतरीन इमारतों में किया जाता था. काउंसिल हाउस में सेफ़्टी बिल पेश होने से दो दिन पहले 6 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त काउंसिल हाउस के असेंबली हॉल गए थे ताकि ये जायज़ा लिया जा सके कि पब्लिक गैलरी किस तरफ़ हैं और किस जगह से वहाँ बम फेंके जाएंगे. वो ये हर क़ीमत पर सुनिश्चित करना चाहते थे कि उनके फेंके गए बमों से किसी का नुक़सान न हो. हाँलाकि 'ट्रेड डिस्प्यूट बिल' पास किया जा चुका था जिसमें मज़दूरों द्वारा की जाने वाली हर तरह की हड़ताल पर पाबंदी लगा दी गई थी, लेकिन 'पब्लिक सेफ़्टी बिल' पर अध्यक्ष विट्ठलभाई पटेल ने अभी तक अपना फ़ैसला नहीं सुनाया था. इस बिल में सरकार को संदिग्धों को बिना मुक़दमा चलाए हिरासत में रखने का अधिकार दिया जाना था.

    14 min
  3. 07/04/2022

    !! जीवन का आनंद!!

    💐💐जीवन का आनंद💐💐 बहुत समय पहले की बात है जब सिकंदर अपने शक्ति के बल पर दुनिया भर में राज करने लगा था वह अपनी शक्ति पर इतना गुमान करने लगा था कि अब वह अमर होना चाहता था उसने पता लगाया कि कहीं ऐसा जल है जिसे पीने से व्यक्ति अमर हो सकता है। देश-दुनिया में भटकने के बाद आखिरकार सिकंदर ने उस जगह को खोज लिया जहां पर उसे अमृत प्राप्त हो सकता था वह एक पुरानी गुफा थी जहां पर कोई आता जाता नहीं था। देखने में वह बहुत डरावनी लग रही थी लेकिन सिकंदर ने एक जोर से सांस ली और गुफा में प्रवेश कर गया वहां पर उसने देखा कि गुफा के अंदर एक अमृत का झरना बह रहा है। उसने जल पीने के लिए हाथ ही बढ़ाया था कि एक कौवे की आवाज आई। कौवा गुफा के अंदर ही बैठा था। कौवा जोर से बोला ठहर रुक जा यह भूल मत करना… सिकंदर ने कौवे की तरफ देखा। वह बड़ी ही दयनीय अवस्था में था, पंख झड़ गए थे, पंजे गिर गए थे, वह अंधा भी हो गया था बस कंकाल मात्र ही शेष रह गया था। सिकंदर ने कहा तू कौन होता है मुझे रोकने वाला…? मैं पूरी दुनिया को जीत सकता हूं तो यह अमृत पीने से मुझे तू कैसे रोकता है! तब कौवे ने आंखों से आंसू टपकाते हुए बोला कि मैं भी अमृत की तलाश में ही इस गुफा में आया था और मैंने जल्दबाजी में अमृत पी लिया। अब मैं कभी मर नहीं सकता, पर अब मैं मरना चाहता हूं लेकिन मर नहीं सकता। देख लो मेरी हालत। कौवे की बात सुनकर सिकंदर देर तक सोचता रहा सोचने के बाद फिर बिना अमृत पीए ही चुपचाप गुफा से बाहर वापस लौट आया। सिकंदर समझ चुका था कि जीवन का आनंद उस समय तक ही रहता है जब तक हम उस आनंद को भोगने की स्थिति में होते हैं। शिक्षा :- जीवन में हमें हमेशा खुश रहना चाहिए। हमें कभी भी खुश रहने के लिए बड़ी सफलता या समय का इंतजार नहीं करना चाहिए, क्योंकि समय के साथ हम बूढ़े होते जाते हैं और फिर अपने जीवन का असली आनंद नहीं उठा पाते हैं। सदैव प्रसन्न रहिये। 🙏🙏🙏🙏

    3 min
  4. 07/03/2022

    !! चिंता !!

    *!! चिंता !!* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था। राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है। विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं। सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे। ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया। *शिक्षा:-* अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं। कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।

    3 min
  5. 07/03/2022

    नियत

    *!! चावल का दाना !!* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ एक भिखारी एक दिन सुबह अपने घर के बाहर निकला। त्यौहार का दिन है। आज गाँव में बहुत भिक्षा मिलने की संभावना है। वो अपनी झोली में थोड़े से चावल दाने डाल कर, बाहर आया। चावल के दाने उसने डाल लिये हैं अपनी झोली में, क्योंकि झोली अगर भरी दिखाई पड़े तो देने वाले को आसानी होती है, उसे लगता है कि किसी और ने भी दिया है। सूरज निकलने के क़रीब है। रास्ता सोया है। अभी लोग जाग ही रहे हैं। मार्ग पर आते ही सामने से राजा का रथ आता हुआ नजर आता है।सोचता है आज राजा से अच्छी भीख मिल जायेगी, राजा का रथ उसके पास आकर रूक जाता है। उसने सोचा, “धन्य हैं मेरा भाग्य ! आज तक कभी राजा से भिक्षा नहीं माँग पाया, क्योंकि द्वारपाल बाहर से ही लौटा देते हैं। आज राजा स्वयं ही मेरे सामने आकर रूक गया है। भिखारी ये सोच ही रहा होता है अचानक राजा उसके सामने एक याचक की भाँति खड़ा होकर उससे भिक्षा देने की मांग करने लगता है। राजा कहता है कि आज देश पर बहुत बड़ा संकट आया हुआ है, ज्योतिषियों ने कहा है इस संकट से उबरने के लिए यदि मैं अपना सब कुछ त्याग कर एक याचक की भाँति भिक्षा ग्रहण करके लाऊँगा तभी इसका उपाय संभव है। तुम आज मुझे पहले आदमी मिले हो इसलिए मैं तुमसे भिक्षा मांग रहा हूँ। यदि तुमने मना कर दिया तो देश का संकट टल नहीं पायेगा इसलिए तुम मुझे भिक्षा में कुछ भी दे दो। भिखारी तो सारा जीवन माँगता ही आया था कभी देने के लिए उसका हाथ उठा ही नहीं था। सोच में पड़ गया की ये आज कैसा समय आ गया है, एक भिखारी से भिक्षा माँगी जा रही है, और मना भी नहीं कर सकता। बड़ी मुशकिल से एक चावल का दाना निकाल कर उसने राजा को दिया। राजा वही एक चावल का दाना ले खुश होकर आगे भिक्षा लेने चला गया। सबने उस राजा को बढ़-बढ़कर भिक्षा दी। परन्तु भिखारी को चावल के दाने के जाने का भी गम सताने लगा। जैसे-तैसे शाम को वह घर आया। भिखारी की पत्नी ने भिखारी की झोली पलटी तो उसमें उसे भीख के अन्दर एक सोने का चावल का दाना भी नजर आया। भिखारी की पत्नी ने उसे जब उस सोने के दाने के बारे में बताया तो वो भिखारी छाती पीटके रोने लगा। जब उसकी पत्नी ने रोने का कारण पूछा तो उसने सारी बात उसे बताई। उसकी पत्नी ने कहा, “तुम्हें पता नहीं, कि जो दान हम देते हैं, वही हमारे लिए स्वर्ण है। जो हम इकट्ठा कर लेते हैं, वो सदा के लिए मिट्टी का हो जाता है।" उस दिन से उस भिखारी ने भिक्षा माँगनी छोड़ दी, और मेहनत करके अपना तथा परिवार का भरण-पोषण करने लगा। जिसने सदा दुसरों के आगे हाथ फैलाकर भीख माँगी थी अब खुले हाथ से दान-पुण्य करने लगा। धीरे-धीरे उसके दिन भी बदलने लगे। जो लोग सदा उससे दूरी बनाया करते थे अब उसके समीप आने लगे। वो एक भिखारी की जगह दानी के नाम से जाना जाने लगा। *शिक्षा:-* जिस इन्सान की प्रवृति देने की होती है उसे कभी किसी चीज की कमी नहीं होती और जो हमेशा लेने की नियत रखता है उसका कभी पूरा नहीं पड़ता।

    4 min
  6. 08/04/2021

    किशोर कुमार

    जानिए आखिर क्यों एमरजेंसी के समय किशोर कुमार के गीतों पर लगा दिया गया था बैन ? जयंती पर विशेष किशोर कुमार हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली हरफनमौला कलाकारों में शुमार हैं। किशोर ने फिल्म इंडस्ट्री में बतौर एक्टर एंट्री की थी। किशोर कुमार की पहली फिल्म #शिकारी' 1946 में रिलीज हुई थी। फिल्म में किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार लीड रोल में थे। किशोर कुमार को पहली बार देव आनंद की फिल्म '#जिद्दी' (1948) में गाने का मौका मिला। आपातकाल में लगा था बैन 4 अगस्त को मध्य प्रदेश के #खंडवा शहर में जन्मे #किशोर_कुमार ने एक से बढ़कर एक हिट गाने दिए लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब उनके गानों को बैन कर दिया गया था। 1975 में जब इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल लगा दिया था। तो इसके शिकार किशोर कुमार भी हुए थे। दरअसल, आपातकाल के दौरान कांग्रेस चाहती थी कि सरकारी योजनाओं की जानकारी किशोर कुमार अपनी आवाज में गाना गाकर दें।उस दौरान सूचना प्रसारण मंत्री #वीसी_शुक्ला थे। उन्होंने किशोर कुमार के पास संदेशा भिजवाया कि वो इंदिरा गांधी के लिए गीत गाएं जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक सरकारी की आवाज पहुंचे लेकिन किशोर कुमार ने गाना गाने से मना कर दिया। किशोर कुमार ने संदेश देने वाले से पूछा कि उन्हें ये गाना क्यों गाना चाहिए तो उसने कहा, क्योंकि वीसी शुक्ला ने ये आदेश दिया है। आदेश देने की बात सुनकर किशोर कुमार भड़क गए और उन्होंने उसे डांटते हुए मना कर दिया। यह बात कांग्रेस को इस कदर नागवार गुजरी कि उन्होंने किशोर कुमार के गाने ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर बैन कर दिए। यह बैन 3 मई 1976 से लेकर आपातकाल खत्म होने तक जारी रहा। किशोर कुमार के गाने ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन पर नहीं चलाए जाते थे। अपनी धुन के पक्के किशोर कुमार ने एक बार कहा था, 'कौन जाने वो क्यों आए लेकिन कोई भी मुझसे वो नहीं करा सकता जो मैं नहीं करना चाहता। मैं किसी दूसरे की इच्छा या हुकूम से नहीं गाता।' जी हां, जो सरकार से भी पंगा ले ले वैसा कोई अपनी वसूलों का पक्का ही कर सकता है। कोई हमदम ना रहा किशोर कुमार का एक बेहद कर्णप्रिय गीत है, ‘कोई हमदम न रहा, कोई सहारा न रहा’ जो आज 50 साल बाद भी टाइमलेस क्लासिक है।यह गीत उनके व मधुबाला के अभिनय से सजी 1961 में आई ‘झुमरू’ फिल्म का है। जिसमें न सिर्फ इस गीत का फिल्मांकन उन पर हुआ था बल्कि इसका संगीत भी उन्होंने ही दिया था,लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस गीत को सबसे पहले उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने गाया था, ‘झुमरू’ बनने के लगभग 25 साल पहले आई वह फिल्म थी ‘जीवन नैया’ (1936)। आंधी फिल्म के सारे गाने मुझे काफी पसंद हैं। सबसे प्यारा गाना है तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं। गोलमाल फिल्म का भी गाना आनेवाला पल बहुत ही सुंदर है। मुकदर का सिकंदर का ओ साथी रे भी लाजवाब है। किशोर साहब के व्यक्तित्व की कुछ बातें ध्यान देने योग्य हैं वे आलराउंडर थे, जिंदादिल थे और कंजूस भी थे । तीन महानायकों की आवाज बने क‍िशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उनकी आवाज के जादू से देवआनंद सदाबहार हीरो कहलाये और राजेश खन्ना को सुपर स्टार बनाने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। कहा जाता है कि किशोर की आवाज के कारण ही अमिताभ बच्चन महानायक कहलाने लगे। पांच रुपया बारह आना किशोर कुमार इन्दौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़े थे और उनकी आदत थी कॉलेज की कैंटीन से उधार लेकर खुद भी खाना और दोस्तों को भी खिलाना। वह ऐसा समय था जब 10-20 पैसे की उधारी भी बहुत मायने रखती थी। किशोर कुमार पर जब कैंटीन वाले के पांच रुपया बारह आना उधार हो गए और कैंटीन का मालिक जब उनको अपने पांच रुपया बारह आना चुकाने को कहता तो वे कैंटीन में बैठकर ही टेबल पर गिलास, और चम्मच बजा बजाकर पाँच रुपया बारह आना गा-गाकर कई धुन निकालते थे और कैंटीन वाले की बात अनसुनी कर देते थे। बाद में उन्होंने अपने एक गीत में इस पांच रुपया बारह आना का बहुत ही खूबसूरती से इस्तेमाल किया। शायद बहुत कम लोगों को पाँच रुपया बारह आना वाले गीत की यह असली कहानी मालूम होगी। उन्होंने 1951 में फणी मजूमदार द्वारा निर्मित फिल्म 'आंदोलन' में हीरो के रूप में काम किया मगर फिल्म फ्लॉप हो गई।

    10 min
  7. 06/10/2021

    साहिर लुधियानवी

    आज रूबरू होते हैं, साहिर साहब की ज़िंदगी के कुछ दिलचस्प पहलुओं से और उनके लेखन की गहराइयों से, ज़िन्दगी का ऐसा कोई पल नहीं जिसपर उन्होंने न लिखा हो। अपने पति फज़ल मोहम्मद से तलाक के बाद इनकी माँ अपने भाई के पास आकर रहने लगीं. साहिर का बचपन भी दूसरे बच्चों से कुछ अलग ही रहा। बचपन में जब उन्हें दूध दिया जाता तो कहते कि इसमें पानी मिलाओ और जब पानी मिलाया जाता तो कहते कि अब इसको अलग करो। उनकी मां उन्हें सर्जन या जज बनाना चाहती थीं, लेकिन किस्मत 'अब्दुल हई' को कुछ और ही बनाना चाहती थी। साहिर को अपना नाम इकबाल की एक नज़्म से मिला जो उन्होंने अपने उस्ताद दाग देहलवी की शान में लिखी थी। इसमें उन्हें 'साहिर' नाम बहुत पसंद आया जिसका मतलब होता है 'जादूगर' यहीं से उन्होंने नए नाम को अपना लिया और इसके साथ जोड़ लिया शहर ए पैदाइश ‘लुधियानवी’। 'चल बसा दाग,अहा! मय्यत उसकी जेब-ए-दोष है आखिरी शायर जहानाबाद का खामोश है इस चमन में होंगे पैदा बुलबुल-ए-शीरीज भी सैकडों साहिर भी होगें, सहीने इजाज भी हूबहू खींचेगा लेकिन इश्क की तस्वीर कौन' मशहूर शायर 'कैफी आजमी' ने 'तल्खियां' की तारीफ में कहा था ~ 'मैं अक्सर यह सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि मैं साहिर को उनकी शायरी के जरिये जानता हूं या फिर उनकी शायरी को खुद उनके जरिये से? मैं यह कबूल करता हूं कि इस बारे में मैं अभी तक किसी नतीजे पर नही पहुंचा हूँ। ऐसा महसूस होता है कि, साहिर ने अपनी शख्सियत का जादू अपनी शायरी में उतार दिया है और उनकी शायरी के जादू का अक्स उनकी शख्सियत में हूबहु उतर आया है। तल्खियां पढते वक़्त ऐसा महसूस होता है कि शायर की रुह अपनी बुलंद तथा साफ आवाज में बात कर रही है' साहिर को जब पंजाब में दंगों की खबर मिली तो वह बहुत परेशान हुए उन्होंने लिखा ~ 'ये जलते हुए घर किसके हैं, ये कटे हुए तन किसके हैं तकरीम के अंधे तूफां में, लुटते हुए गुलाब किसके हैं ऐ सहबर मुल्क ओ कौम बता, ये किसका लहू है और कौन मरा' मुंबई में अपने संघर्ष को उन्होंने कुछ यूँ बयां किया ~ 'यार ! ये मुम्बई शहर है, बाहर से आये लोगों से दो साल जद्दोज़हद मांगता है और इसके बाद बड़े प्यार से गले लगाता है।' उनकी फिल्मों में गीत लिखने की शुरुआत १९४५ में हुई। उन्होंने पहली बार फ़िल्म 'आजादी की राह पर' के लिए गीत लिखे। इस दौरान इनकी मुलाकात मजरूह सुलतानपुरी, कैफी आज़मी, मजाज़ लखनवी जैसी हस्तियों से हुई। साहिर की शोहरत का आलम यह था कि जब बी आर चोपड़ा के छोटे भाई यश चोपड़ा मुंबई आए तो उन्होंने किसी हीरो हीरोइन से नहीं बल्कि साहिर से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की थी। साहिर साहब की एक और दिलचस्प बात उनके जो गीत लता जी गाती थीं। उस गीत की फ़ीस वो लता जी की फ़ीस से १ रुपए ज्यादा लेते थे। इस कारण लता जी ने साहिर साहब के काफी गीत नहीं गाये। बाद में बी आर चोपड़ा के समझाने पर लता मंगेशकर वापस साहिर के गीत गाने लगीं। साहिर साहब की शायरी के अलग अलग पहलू ~ #एक_तरफ_मोहब्बत_नजर_आती_है तआरुफ़ रोग बन जाए तो उसको भूलना बेहतर तआलुक बोझ बन जाए तो उसको तोड़ना अच्छा वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा #तो_दूसरी_तरफ_ताजमहल_पर_खफा_हो_रहे_हैं ये चमनज़ार ये जमुना का किनारा ये महल ये मुनक़्क़श दर-ओ-दीवार, ये महराब ये ताक़ इक शहंशाह ने दौलत का सहारा ले कर हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक़ मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझ से! #किसी_नज़्म_में_अच्छी_सुबह_की_उम्मीद वो सुबह कभी तो आएगी, वो सुबह कभी तो आएगी इन काली सदियों के सर से, जब रात का आंचल ढलकेगा जब अम्बर झूम के नाचेगी, जब धरती नग़मे गाएगी वो सुबह कभी तो आएगी … #तो_कहीं_समाज_की_गलतियों_पे_तंज ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया ये इनसां के दुश्मन समाजों की दुनिया ये दौलत के भूखे रिवाज़ों की दुनिया ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है #तो_कभी_रूमानी अभी ना जाओ छोड़ के, कि दिल अभी भरा नहीं #तो_कभी_दार्शनिक_भाव मैं पल दो पल का शायर हूं पल दो पल मेरी कहानी है #तो_कभी_एक_खिन्न_कवि कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है #तो_कभी_एक_समर्पित_कवि मेरे दिल में आज क्या है तू कहे तो मैं बता दूं #जीवन_से_संतुष्ट_भाव मांग के साथ तुम्हारा मैंने मांग लिया संसार! #प्रेम_से_समझौता_करने_का_भाव चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों #मोहब्बत_में_निराशा जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला #एक_निश्चिंत_कवि मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया #एक_असांसारिक_भाव ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है #देशप्रेम_की_भावना ये देश है वीर जवानों का #एक_विद्रोही_शायर जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां है #एक_निराशावादी_भाव तंग आ चुके हैं कशमक

    36 min

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