दण्डी स्वामी सदाशिव ब्रह्मेन्द्रानन्द सरस्वत

Sadashiva Brahmendranand Saraswati

योग-वेदान्त पर दण्डी स्वामी सदाशिव ब्रह्मेन्द्रानन्द सरस्वती जी के प्रवचन। प्रस्थानत्रयी, योगसूत्र, योगवासिष्ठ इत्यादि के अतिरिक्त श्रीरामचरित मानस, रामायण, महाभारत एवं पुराण इत्यादि की वेदान्तपरक व्याख्या।

  1. 01/11/2023

    एपिसोड 737. सदाचारशतकम् 13 - पूजा-व्रत इत्यादि के सामान्य नियम

    एपिसोड 737. सदाचार शतकम् 13 *देवपूजन सम्बन्धी व्यतिक्रम एवं अशुद्वि इत्यादि का उपचार एवं व्रत सम्बन्धी सामान्य मार्गदर्शन* विषयसूची - 1. पूजा का लोप हो जाने पर क्या करें। 2. पूजनसामग्री के चूहा कीट इत्यादि द्वारा दूषित होने अथवा अशुद्ध मनुष्य द्वारा स्पर्श हो जाने पर क्या करें। 3. *विशेष ध्यातव्य* - गौ का प्रत्येक अंग शुद्ध किन्तु मुख अशुद्ध होता है और घोडे़ का मुख शुद्ध कहा गया है। 4. पूजन के समय मंत्र में त्रुटि हो जाने पर क्या करें। 5. देवप्रतिमा हाथ से छूटकर गिर जाय तो क्या करें। -------------------------- 6. स्त्री दीर्घकालीन व्रत में अथवा साधारण व्रत में रजस्वला हो जाय तो क्या करे। 6. व्रत में सूतक आ जाय तो क्या करें। 8. ओषधि इत्यादि वह वस्तुयें जिनके सेवन से व्रतभंग नहीं होता। 9. व्रत के समापन में सामान्यतया क्या करें।

  2. 01/10/2023

    एपिसोड 736. सदाचार शतकम् 12. सोलह संस्कार

    एपिसोड 736. सदाचार शतकम्- 12. षोडश संस्कार विषयसूची - 1. संस्कारों की कुल संख्या 48 या अल्प मतान्तर से 40 है जिसमें 16 प्रमुख हैं। 2. सोलह संस्कारों के नाम। 3.आरम्भ के नौ संस्कार चारों वर्णों के और स्त्री पुरुष सभी के होते हैं। किन्तु स्त्रियों और शूद्रों के मन्त्ररहित होते हैं। 4. उक्त सोलह में से क्रमांक 10 से 13 तक के संस्कार (यज्ञोपवीत से समावर्तन तक) केवल त्रैवर्णिक पुरुषों का होता है। * उपनयन संस्कार के विना ओंकार, गायत्री अथवा अन्य किसी वैदिक मन्त्र के जप या स्वाहा, स्वधा, वषट्कार इत्यादि के उच्चारण का अधिकार नहीं। स्त्री शूद्र और विना यज्ञोपवीत वाले त्रैवर्णिक पूजा पाठ में मन्त्रका प्रयोग किये विना देवताओं को केवल नमस्कार कर सकते हैं। जैसे "श्री गणेशाय नमः" "शिवाय नमः"। इसमें ॐ नहीं लगा सकते। *14वां संस्कार - विवाह सभी वर्णों का होता है।शूद्र का विवाह संस्कार भी मन्त्ररहित होता है। *त्रैवर्णिक कन्या का विवाहसंस्कार मन्त्रसहित ही होता है, क्योंकि वह वर के साथ संयुक्त है।। *विवाह समान वर्ण में ही होना चाहिये, न अपने से उत्तम के साथ न अधम के साथ - "विवाहःसदृशैस्तेषां नोत्तमैर्नाधमैस्तथा" - अग्नि,151/13. *प्रश्न - शूद्र कन्या से कोई त्रैवर्णिक विवाह करे तो मन्त्ररहित होगा या मन्त्रसहित ? उत्तर - शूद्रा से त्रैवर्णिक का विवाह निन्द्य है। विवाह का संस्कार स्त्रीपुरुष के लिये संयुक्त होता है।अतः ऐसा विवाह विना मन्त्र के ही हो सकता है। प्रश्न - सवर्ण, अनुलोम और प्रतिलोम सम्बन्ध क्या हैं ? उत्तर - अपने वर्ण में विवाह करना सवर्ण सम्बन्ध है।अपने से नीचे वाले वर्ण की कन्या से विवाह करना अनुलोम सम्बन्ध है। अपने से ऊपर के वर्ण वाली कन्या से सम्बन्ध करना प्रतिलोम सम्बन्ध है जो निषिद्ध है, अतः इसे विवाह नहीं कह सकते। इसमें मन्त्ररहित अथवा मन्त्रसहित का प्रश्न ही नहीं बनता।

  3. 12/22/2022 ·  Bonus

    एपिसोड 732. वेदान्तकक्षा में स्मृतिचर्चा क्यों ?

    वेदान्त की कक्षा में स्मृतिचर्चा क्यों ? *शास्त्रवचन है कि वेद और स्मृति - यह दोनों द्विजों की दो आंखें हैं। केवल एक को जानने वाला काणा है और जो एक भी नहीं जानता वह पूर्णतः अन्धा है। * वेदान्त में सभी वर्णों और सभी आश्रमियों का अधिकार है। किन्तु उसके लिये जो साधनचतुष्ट्य की शर्तें हैं, उनको पूर्ण करना आवश्यक है। उन शर्तों को वही पूरा कर सकता है जो सदाचारी हो। सदाचार का ज्ञान स्मृतियों से मिलता है। अतः जो स्मृतियों की निन्दा करता है, जो वर्णाश्रम को नहीं मानता है, वह साधन चतुष्ट्य से बहुत दूर है और उसका वेदान्त पढ़ना उसके लिये और समाज के लिये भी कल्याणकारी न होकर पतनकारी ही होता है। पुनश्च, वेदान्तज्ञान के लिये चित्त का शुद्ध होना आवश्यक है। संसार में ऐसा कौन होगा जो अपने चित्त को अशुद्ध मानता हो? चित्त शुद्ध है, इस बात की परख प्रथमतया सदाचार से ही हो सकती है। सदाचारके पालन से ही चित्त शुद्ध होता है और चित्तशुद्ध होने पर ही तत्वज्ञान होता है।

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