राजेन्द्र प्रियदर्शी

Rajendra Priyedarshi

पालि भासा और सदधम्म का सुरक्षित होना।

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  1. 02/06/2021

    धम्म लिपि/अशोकन लिपि की पालि भासा का गिहारा जनजाति के लोगों द्वारा वर्तमान काल तक सुरक्षित रखना:

    मित्रों यह लेख भारत के शिला लेखों में उत्कीर्ण शिल्पकारों के द्वारा मूर्त रूप दिया गया वह कारनामा है जो विश्व की सर्व प्रथम लिखित शिला लेखों में लिखी पुस्तक के सम्मान से सम्मानित है। गिहार एक ऐसी जनजाति है जो शिल्पकार, घूमंतु, विमुक्त बंजारा आदि नामों से जानी जाती है।प्रस्तुत लेख प्राचीन भाषाई तथ्यों के आधार पर उसमें समानताओ, परंपराओं का एक शुरुआती अध्ययन मात्र है।अभी हमें बहुत लम्बा रास्ता तय करना है।पर एक बात तय है की आसी, पीसी,ख़ासी, करसु, चलसु, बोलसु आदि बोली के सारे सब्द राजस्थानी भाषा व केवल आज की साहित्यिक संस्कृत भाषा में ही मिलते है। 16 महा जनपद काल में आज का राजस्थान किसी महाजनपद नाम से जाना नहीं जाता था। यह मोर्ये साम्राज्य का अभिन्न अंग था।अतः गिहारा भाषा जिसे ये लोग आज भी “भासा” सब्द से पुकारते है वह अनेक संदेहों को दूर करती प्रतीत होती है।

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पालि भासा और सदधम्म का सुरक्षित होना।