
गुरु शिष्य परंपरा
गुरु के प्रति सम्मान देना ही हमारी सफलता की पहलिवसिद होती है सदा से और रहनी चाहिए। विद्या मुक्ति की साधना है और गुरु इसी विद्या की अनेक धाराओं का संगम यदि किसी मनुष्य ने गुरु का मंत्र ग्रहण नहीं किया तो समझ ही वह पृथ्वी पर भाड़ स्वरूप है ऐसा मानव कभी गुरु महिमा का विस्तार नहीं कर सकता इसलिए मनुष्य को गुरु का अनुशासन प्रेम और आशीष समय पर प्राप्त कर लेना चाहिए तभी वह गुरु भक्ति और गुरु शक्ति का भाग बनने में सक्षम हो सकेगा महान गुरु ही जीवन का सच्चा निर्माता है वह अपने बुद्धि को सन से शिष्य के चरित्र का निर्माण करता है यह गुरु की महिमा ही है वह अपने गुरु से भी आगे बढ़कर अपने शिष्य को महान बनाता है भगवान श्री राम के लिए गुरु वशिष्ठ पांडवों के लिए गुरु द्रोण और चक्रवर्ती सम्राट समुद्रगुप्त के लिए आचार्य चाणक्य जैसे ही उनकी समग्र सफलता के स्रोत इसलिए विद्यादान की कृपा ही अपने शिष्यों का अभिवादन करने का माध्यम से होती है जीवन में दो अनोखी अनुभूतियों का ख्याल रखना चाहिए एक ज्ञान शक्ति खुद के अंदर है दूसरी उस ज्ञान शक्ति को जगाने वाले सच्चे महान इन्होंने हमारे जीवन ज्योति को जगाया विकसित किया और हमें इस संसार में प्रेरणा स्वरूप बनकर जीने का अधिकार दिलाया उस लायक बनाया गुरु का काम समय अध्यात्मिक शक्ति का संचार करना है उसकी बुद्धि तेज करना द्वारा अपने को प्रेम और निष्ठा से उड़ेल देने में उन सभी शिक्षकों का मूल है धर्म भारतीय परंपरा में शिक्षा दान का कार्य त्यागी लोगों ने ही किया है जब तक ऐसा रहा तब तक भारत का कल्याण हुआ विवेकानंद के अनुसार जब तक इस देश में शिक्षा का भागी लोगों को नहीं दिया जाता भारत प्राकृतिक रूप से स्वतंत्र दिन होगा जिस दिन यहां की शिक्षा संस्कृति सम्मिलित होगी और सोने की चिड़िया का रहने वाला देश पुनः विश्व ग
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- Creatorpradip kumar thakur
- Episodes2
- RatingClean
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