Ek Kavita Sunein?

Supriya Sharma

Readings of Hindi-Urdu poems. No more, no less. Because, poetry should be listened to, not read.

Episodes

  1. 09/15/2022

    Bharat Bhushan Agarwal - Mera Pitthu

    देह से अकेला होकर भी मैं दो हूँ मेरे पेट में पिट्ठू है। जब मैं दफ़्तर में साहब की घंटी पर उठता-बैठता रहता हूँ, मेरा पिट्ठू नदी किनारे वंशी बजाता रहता है! जब मेरी ‘नोटिंग’ कट-कुट कर ‘टाइप’ होती है तब साप्ताहिक के मुख पृष्ठ पर मेरे पिट्ठू की तस्वीर छपती है! शाम को जब मैं बस के फुटबोर्ड पर टँगा-टँगा घर आता हूँ तब मेरा पिट्ठू चाँदिनी की बाँहों में बाँहें डाले मुग़ल-गार्डेंस में टहलता रहता है! और जब मैं बच्चे की दवा के लिए ‘आउटडोर वार्ड’ की क्यू में खड़ा रहता हूँ। तब मेरा पिट्ठू कवि-सम्मेलन के मंच पर पुष्पमालाएं पहनता है! इन सरगर्मियों से तंग आकर मैं अपने पिट्ठू से कहता हूँ: भई! यह ठीक नहीं एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं, तो मेरा पिट्ठू हँसकर कहता है: पर एक जेब में दो कलमें तो सभी रखते हैं! तब मैं झल्लाकर, आस्तीनें चढ़ाकर अपने पिट्ठू को ललकारता हूँ- तो फिर जा, भाग जा, मेरा पिंड छोड़, मात्र कलम बनकर रह! और यह सुनकर वह चुपके से मेरे सामने गीता की कॉपी रख देता है! और जब मैं हिम्मत बांधकर आँखें मींचकर, मुट्ठियाँ भींचकर तय करता हूँ कि अपनी देह उसी को दे दूँगा तब मेरा पिट्ठू मुझे झकझोरकर ‘एफिशिएंसी बार’ की याद दिला देता है! एक दीखने वाली मेरी इस देह में दो ‘मैं’ है। एक मैं और एक मेरा पिट्ठू। मैं तो खैर, मामूली-सा क्लर्क हूँ पर, मेरा पिट्ठू? वह जीनियस है!

    2 min
  2. 08/30/2022

    Bhawani Prasad Mishr's 'Main jo hoon' by Supriya Sharma

    मैं जो हूँ मुझे वहीं रहना चाहिए। यानी वन का वृक्ष खेत की मेड़ नदी की लहर दूर का गीत व्यतीत वर्तमान में उपस्थित भविष्य में मैं जो हूँ मुझे वहीं रहना चाहिए तेज गर्मी मूसलाधार वर्षा कड़ाके की सर्दी खून की लाली दूब का हरापन फूल की जर्दी मैं जो हूँ मुझे अपना होना ठीक ठीक सहना चाहिए तपना चाहिए अगर लोहा हूँ हल बनने के लिए बीज हूँ तो गड़ना चाहिए फल बनने के लिए मैं जो हूँ मुझे वह बनना चाहिए धारा हूँ अन्त: सलिला तो मुझे कुएँ के रूप में खनना चाहिए ठीक जरूरतमंद हाथों से गान फैलाना चाहिए मुझे अगर मैं आसमान हूँ मगर मैं कब से ऐसा नहीं कर रहा हूँ जो हूँ वही होने से डर रहा हूँ ।

    1 min
  3. 08/30/2022

    Sarveshwar Dayal Saxena's 'Khali Samay Mein' by Supriya Sharma

    खाली समय में, बैठ कर ब्लेड से नाखून काटें, बढी हुई दाढी में बालों के बीच की खाली जगह छांटे, सर खुजलाएं, जम्हुआए, कभी धूप में आए, कभी छांह में जाए, इधर-उधर लेटें, हाथ-पैर फैलाएं, करवटें बदलें दाएं-बाएं, खाली कागज पर कलम से भोंडी नाक, गोल आंख, टेढे मुंह की तसवीरें खींचें बार-बार आंखें खोले बार-बार मींचें, खांसें, खंखारें, थोडा बहुत गुनगुनाएं, भोंडी आवाज में, अखबार की खबरें गाए, तरह-तरह की आवाज गले से निकालें, अपनी हथेली की रेखाएं देखें-भालें, गालियां दे-दे कर मक्खियां उडाएं, आंगन के कौओं को भाषण पिलाए, कुत्ते के पिल्ले से हाल-चाल पूछें, चित्रों में लडकियों की बनाएं मूंछे, धूप पर राय दें, हवा की वकालत करें, दुमड-दुमड तकिए की जो कहिए हालत करें, खाली समय में भी बहुत से काम है किस्मत में भला कहां लिखा आराम है!

    2 min
  4. Paash's 'Sabse Khatarnaak' by Snehil Basoya

    08/30/2022

    Paash's 'Sabse Khatarnaak' by Snehil Basoya

    मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं होता कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है जुगनुओं की लौ में पढ़ना मुट्ठियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना बुरा तो है सबसे ख़तरनाक नहीं होता सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना तड़प का न होना सब कुछ सहन कर जाना घर से निकलना काम पर और काम से लौटकर घर आना सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो आपकी नज़र में रुकी होती है सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है जो सब कुछ देखती हुई जमीं बर्फ़ होती है और जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्‍बत से चूमना भूल जाती है जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है जो रोज़मर्रा के क्रम को पीती हुई एक लक्ष्यहीन दोहराव के उलटफेर में खो जाती है सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है जो हर क़त्ल हर कांड के बाद वीरान हुए आंगन में चढ़ता है लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता है सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है आपके कानों तक पहुँचने के लिए जो मरसिए पढ़ता है आतंकित लोगों के दरवाज़ों पर गुंडों की तरह अकड़ता है सबसे ख़तरनाक वो रात होती है जो ज़िंदा रूह के आसमानों पर ढलती है जिसमें सिर्फ़ उल्लू बोलते और हुआं हुआं करते गीदड़ हमेशा के अंधेरे बंद दरवाज़ों और चौखटों पर चिपक जाते हैं सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है जिसमें आत्‍मा का सूरज डूब जाए और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा आपके जिस्‍म के पूरब में चुभ जाए मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।

    3 min

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