Pratidin Ek Kavita

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कवितायेँ जहाँ जी चाहे वहाँ रहती हैं- कभी नीले आसमान में, कभी बंद खिड़कियों वाली संकरी गली में, कभी पंछियों के रंगीन परों पर उड़ती हैं कविताएँ, तो कभी सड़क के पत्थरों के बीच यूँ ही उग आती हैं। कविता के अलग अलग रूपों को समर्पित है, हमारी पॉडकास्ट शृंखला - प्रतिदिन एक कविता। कीजिये एक नई कविता के साथ अपने हर दिन की शुरुआत।

  1. 30m ago

    Chandini | Ramvilas Sharma

    चाँदनी । रामविलास शर्मा चाँदी की झीनी चादर-सी फैली है वन पर चाँदनी। चाँदी का झूठा पानी है यह माह-पूस की चाँदनी। खेतों पर ओस-भरा कुहरा, कुहरे पर भीगी चाँदनी; आँखों में बादल-से आँसू, हँसती है उन पर चाँदनी। दु:ख की दनिया पर बुनती है माया के सपने चाँदनी। मीठी मुस्कान बिछाती है भीगी पलकों पर चाँदनी। लोहे की हथकड़ियों-सा दु:ख, सपनों-सी झूठी चाँदनी; लोहे से दु:ख को काटे क्या सपनों-सी मीठी चाँदनी। यह चाँद चुरा कर लाया है सूरज से अपनी चाँदनी। सूरज निकला, अब चाँद कहाँ? छिप गई लाज से चाँदनी। दु:ख और कर्म का यह जीवन, वह चार दिनों की चाँदनी। यह कर्म-सूर्य की ज्योति अमर, वह अंधकार की चाँदनी।

    Chandini | Ramvilas Sharma
  2. 1d ago

    Parcham | Kumar Ambuj

    परचम।  कुमार अम्बुज  वहाँ एक फूल खिला हुआ है अकेला  कोई उसे छू भी नहीं रहा है  किसी सुबह शाम में वह झर जाएगा  लेकिन देखो, वह खिला हुआ है बारिश, धूल और यातनाओं को और ऋतुओं को  जज़्ब करते हुए  एक पत्थर भी है वहाँ किसी की प्रतीक्षा में  आसपास की हर चीज़ इशारा करती है  तालाब किनारे अँधेरी झाड़ियों में चमकते हैं जुगनू  दुर्दिनों के किनारे शब्द मुझे प्यास लग आयी है और यह सपना नहीं है  जैसे पेड़ की यह छाँह मंज़िल नहीं  यह समाज जो आख़िर एक दिन आज़ाद होगा  उसकी संभावना मरते हए आदमी की आँखों में है  और असफलता मृत्यु नहीं है  यह जीवन है, धोखेबाज़ पर भी मुझे विश्वास करना होगा  निराशाएँ अपनी गतिशीलता में आशाएँ हैं 'मैं रोज़ परास्त होता हूँ'- इस बात के कम से कम बीस अर्थ हैं यों भी एक-दो अर्थ देकर  टिप्पणीकार काफ़ी कुछ नक़सान पहुँचा चुके हैं  गणनाएँ असंख्य को संख्या में न्यून करती चली जाती हैं सतह पर जो चमकता है वह परावर्तन है उसके नीचे कितना कुछ है अपार  शांत, चपल और भविष्य से लबालब भरा हुआ।

    Parcham | Kumar Ambuj
  3. 2d ago

    Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar

    बुरी औरत के सपनों में । कैलाश मनहर बुरी औरत के सपनों में नहीं होता पति और चरित्र और मर्यादाएँ बन्द खिड़कियों वाला पिंजरेनुमा घर बुरी औरत के सपनों में नहीं होती बदन को धरती बनाकर धान कुटवाने वाली निर्जीव सहन-शक्ति बचपन के प्रेम को भूल जाने वाला परिवार की प्रतिष्ठा के नाम का पाखण्ड-पर्व कभी नहीं होता बुरी औरत के सपनों में दुनियादारी के घुटते हुए अँधेरे की चहारदीवारी में आत्महत्या का अनायास आदर्श नहीं होता बुरी औरत के सपनों में। बुरी औरत के सपनों में आता है एक स्वच्छन्द बहती हुई नदी का दृश्य और मनचाहे फूल पर बैठती हुई तितली के पंख बुरी औरत के सपनों में बार-बार आता है जिबह करने को लाया जाता ख़ूबसूरत मेमना उसके स्वच्छन्द बहते रंगों पर टपक जाते हैं किसी निर्दोष आत्मा के पवित्र प्रेमाश्रु बुरी औरत के सपनों में उबलता है बुरे लोगों के बुरे कामों के विरूद्ध हृदय का लावा ।

    Buri Aurat Ke Sapnon Mein | Kailash Manhar
  4. 5d ago

    Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma

    आज शाम है बहुत उदास । भगवतीचरण वर्मा आज शाम है बहुत उदास केवल मैं हूँ अपने पास । दूर कहीं पर हास-विलास दूर कहीं उत्सव-उल्लास दूर छिटक कर कहीं खो गया मेरा चिर-संचित विश्वास । कुछ भूला सा और भ्रमा सा केवल मैं हूँ अपने पास एक धुन्ध में कुछ सहमी सी आज शाम है बहुत उदास । एकाकीपन का एकान्त कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त । थकी-थकी सी मेरी साँसें पवन घुटन से भरा अशान्त, ऐसा लगता अवरोधों से यह अस्तित्व स्वयं आक्रान्त। अंधकार में खोया-खोया एकाकीपन का एकान्त मेरे आगे जो कुछ भी वह कितना निष्प्रभ, कितना क्लान्त। उतर रहा तम का अम्बार मेरे मन में व्यथा अपार। आदि-अन्त की सीमाओं में काल अवधि का यह विस्तार क्या कारण? क्या कार्य यहाँ पर ? एक प्रश्न मैं हूँ साकार। क्यों बनना? क्यों बनकर मिटना? मेरे मन में व्यथा अपार औ समेटता निज में सब कुछ उतर रहा तम का अम्बार। सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास, आज शाम है बहुत उदास। जोकि आज था तोड़ रहा वह बुझी-बुझी सी अन्तिम साँस और अनिश्चित कल में ही है मेरी आस्था, मेरी आस। जीवन रेंग रहा है लेकर सौ-सौ संशय, सौ-सौ त्रास, और डूबती हुई अमा में आज शाम है बहुत उदास।

    Aaj Shaam Hai Bahut Udaas | Bhagwati Charan Verma
  5. Oct 3

    Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari

    बागी बियाबान औरतें।  ऐश्वर्या तिवारी   लोग कहते हैं वो औरत है ही कहाँ, ज़्यादा  सही शब्द है आफ़त। उसके गले में कोई मंगलसूत्र नहीं, एक सूखी नदी लटकी है जिस पर कभी किसी ने नाव चलाने की ज़िद की थी और आधे में ही डर गया। वो हँसती है तो लगता है जैसे किसी पुराने मकान की दीवार अचानक गिर पडी हो - लोग भागते हैं मलबा बचाने, वो बस अपनी हँसी से धूल झाड़ती है। उसकी देह पर कपड़े कम हैं, किस्से ज़्यादा। हर तह से कोई मर्द निकलता है जो कभी उसे देवी बुलाता था, कभी डायन, और कभी 'दोस्त', और हर नाम के साथ उसके भीतर की मिट्टी और पत्थर थोड़े-थोड़े हमेशा बदलते रहे हैं। वो बियाबान है क्योंकि उसने अपने भीतर की  हरी घास खुद उखाड़कर फेंक दी थी।  जिस दिन उसे समझ आया कि लोग उसकी खूबसूरती पर नहीं, उसकी "कमीज़ की आख़िरी बटन" पर कविताएं लिखते हैं। उस रात उसने अपने सीने पर हाथ रखकर कहा था "ये दिल नहीं, अदालत है, और आज से सिर्फ यहाँ एक ही मुकदमा चलेगा ख़ुद बनाम दुनिया।" वो चाय बनाते हुए भी इंक़लाब सोचती है, लोटे में पानी भरते हुए आज़ादी मापती है, और जब दुपट्टा झाड़ती है तो जैसे सदियों की धूल आसमान पर फेंक देती है कोई तारा कम भी हो जाए, तो उसे कोई परवाह नहीं। उसकी चाल में बाज़ार की चालाकी नहीं, कब्रिस्तान जैसी सच्चाई है - शांत, साफ़, अन्तिम। वो किसी की अमानत नहीं, ना बाप की इज्ज़त, ना पति की नाक, ना प्रेमी का राज़ वो अपने ही गुनाहों की इकलौती वारिस है - गिनती भी खुद रखती है, और माफ़ी भी खुद दे देती है। लोग उसे "बागी" बुलाते हैं  क्योंकि वो "हाँ से पहले "क्यों' पूछ लेती है, "कब लौटोगे?" से पहले "क्यों रहूं" सोच लेती है। वो बियाबान है पर सूखा नहीं। उसके भीतर किसी पुराने मेहबूब की भूली हुई ख़ुशबू बसी हुई है  कभी-कभी रात में वो खुद से पूछती है - "अगर मैं इतनी ही बुरी हूँ  तो मेरी आँख  में पानी का एक कतरा अब भी क्यों बाकी है?" कोई जवाब नहीं देता। बस उसकी परछाई दीवार से उतरकर उसके साथ बैठ जाती है। दोनों मिलकर सिगरेट सुलगाती हैं, एक ही धुए को भीतर खींचती हैं फ़र्क़ बस इतना है, कि एक की आँख  में आँसू हैं, और दुसरे की आँख में आग। सुबह होते-होते आग और आँसू एक ही नमी में बदल जाते हैं। और वो औरत, जो शहर की नज़रों में "बागी बियाबान" है, अपने भीतर से चुपचाप एक नन्हा सा बीज उठाती है, ज़मीन में नहीं, ज़ुबान पर बो देती है ताकि अगली बार जब वो बोले, कोई फूल नहीं, सीधा जंगल उगे।

    Baaghi Biyabaan Auratein | Aishwarya Tiwari

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